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भारतीय जाति/समुदाय आधारित विकेन्द्रित व्यापार परंपरा

इस शोधपत्र के आधार पर यह कहा जा सकता है कि भारत का व्यापार भारत की जातियों, समुदायों तथा लघु उद्योगों पर टिका हुआ है | जितनी भी बार दुनिया में मंदी का दौर आया है तब भारत इन्ही असंगठित क्षेत्र के छोटे उद्योगों तथा परिवार व्यवस्था की बचत के आधार पर बचा है |

भारतीय ग्रंथों तथा पुराणों में देवी दुर्गा का वर्णन – भाग ९

‘भारतीय ग्रंथों तथा पुराणों में देवी दुर्गा का वर्णन’ शृंखला के अन्तिम भाग में मनीष श्रीवास्तव जी शुम्भ वध की कथा का वर्णन कर रहे हैं।

भारतीय ग्रंथों तथा पुराणों में देवी दुर्गा का वर्णन – भाग ८

धूम्रलोचन, चंड-मुंड तथा रक्तबीज जैसे अनिष्टों का वध करने के बाद इस अंक में देवी के समक्ष रणभूमि में प्रवेश कर रहे हैं शुम्भ-निशुम्भ।

भारतीय ग्रंथों तथा पुराणों में देवी दुर्गा का वर्णन – भाग ६

यह कथा श्रीमार्कंडेय पुराण में, सावर्णिक मन्वंतर की कथा के अंतर्गत, देवीमाहाम्य में छठे अध्याय में वर्णित थी। इस अंक में हम चंड-मुंड और महादेवी युद्ध का वर्णन पढने वाले हैं।

भारतीय ग्रंथों तथा पुराणों में देवी दुर्गा का वर्णन – भाग ५

‘भारतीय ग्रंथों तथा पुराणों में देवी दुर्गा का वर्णन’ शृंखला के आज के अंक में देवी द्वारा धूम्रलोचन का वध और शुम्भ निशुम्भ के रणभूमि में आगमन की कथा।

भारतीय ग्रंथों तथा पुराणों में देवी दुर्गा का वर्णन – भाग ४

शुम्भ तथा निशुम्भ से तिरस्कृत देवतागण अपराजिता देवी का स्मरण कर माँ जगदम्बा की शरण में जाते है तथा भगवती विष्णु माया की स्तुति में लीन हो जाते हैं। स्तुति से प्रसन्न हो, देवी पार्वती की कोशिकाओं से कौशिकी प्रकट हो देवगणों को दर्शन देती हैं।

भारतीय ग्रंथों तथा पुराणों में देवी दुर्गा का वर्णन – भाग ३

पिछले अंक में हमने आपको महाकाली की कथा से अवगत कराया था। इस अंक में हम आपको महिषासुरमर्दिनी देवी की कथा, के बारे में बताने वाले हैं।

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भारतीय ग्रंथों तथा पुराणों में देवी दुर्गा का वर्णन – भाग २

पहले अंक में हम चर्चा कर रहे थे देवी महामाया की, जिनका वर्णन चंडी पाठ, रामायण तथा महाभारत जैसी रचनाओं में पौराणिक काल से चला आ रहा है। पहला तथा सबसे प्रभावशाली वर्णन दुर्गा सप्तशती या चंडी पाठ में किया गया है। जिनकी कथा इस बार हम आपके सामने प्रस्तुत करने वाले हैं।

भारतीय ग्रंथों तथा पुराणों में देवी दुर्गा का वर्णन – भाग १

प्राचीन ऋषि जिनके लिए माना जाता है, ध्यान के माध्यम से वह हमारे ब्रह्मांड की प्राकृतिक ऊर्जा को आत्मसात करने में सक्षम थे। वह भी उषा, इला तथा सरस्वती आदि दिव्य मातृ शक्तियों की बात करते हैं। आगे चलकर पुराणों में, जिनमें ब्रह्मांड के निर्माण, विनाश, देवताओं की वंशावली आदि दृष्टांत शामिल हैं, यही दिव्य मातृ शक्ति, अमंगलीय शक्तियों पर मंगलकारी शक्तियों की विजय तथा दुष्टों का विनाश करने वाली एक शक्ति बन गईं।