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स्वस्थवृत्त- स्वस्थ रहने का एक उत्कृष्ट विचार भाग VIII


३. ऋतुचर्या

आरोग्यमायुरर्थो वा नासद्भि: प्राप्यते नृभि:।

सु. सं. २४।३३

विश्व के अनेक अन्य देशो की तुलना में भारत की विशेषता यह है कि वह आयुर्वेद की दॄष्टि से साधारण या मिश्रलक्षण (अनूप तथा जांगल लक्षणों से युक्त) देश है। साधारण देश में शीत, वर्षा, गर्मी तथा वायु समान रूप से होते हैं। इसलिये वात, पित्त तथा कफ इन तीन दोषों की वहन पर समता होने से यह देश उत्तम कहा जाता है। साधारण या मिश्रलक्षण देश होने के कारण भारत के वातावरण में प्राकृतिक रूप से स्वस्थ रहना सुगम है। इसी ॠतु भिन्नता के कारण हमारे अन्न में, शाक, फल-फूलो में रस होता है, गंध होती है तथा अनेक स्वास्थ्यवर्धक गुण होते हैं।

ऋतु, काल का पर्याय भी है तथा काल का विभाग भी है। ऋतुओं में वर्षा, शरत, हेमंत को सूर्य दक्षिणायन अर्थात दक्षिण दिशा से गमन करता है तथा शिशिर, वसंत, ग्रीष्म में सूर्य उत्तरायण अर्थात उत्तर दिशा से गमन करता है। यह छह ऋतुएं माघ से लेकर दो-दो महीने के एक-एक ऋतु के क्रम से होती हैं। प्रत्येक ऋतु का काल अलग होता है, उस समय वातावरण की स्थिति अलग होती है तथा उसी प्रकार हमारे शरीर में त्रिदोष अर्थात वात-पित्त-कफ की स्थिति भी ऋतु के साथ बदलती है।

भाव प्रकाश में भाव मिश्र बताते हैं:

 क्षयकोपशमा यस्मिन्दोशाणां संभवन्ति हि। ऋतुशट्कं तदाख्यातं रवे राशिषु संक्रमात्।।

अर्थात जिस समय दोषों की वृद्धि, कोप तथा शमन हुआ करता है, उस समय को ऋतु कहते हैं तथा इसलिये ऋतुसंधि यानि ऋतु परिवर्तन पर अधिकांश यज्ञ होते हैं। तथा इसी प्रकार सभी ऋतुसन्धि काल में स्वास्थ्य की दृष्टि से विशेष बातों का ध्यान देना होता है। आजकल “रूटीन” या “हेल्थ रेजीम” के रुझान के चलते चर्या में बड़ी जड़ता आ गयी है तथा इन सैद्धांतिक ऋतु नियमों का पालन हम अज्ञान, झंझट या इन्हें अवैज्ञानिक समझ कर नहीं करते। इस तरह जीवनभर अपने स्वास्थ्य का क्षय करते हैं, अपने कोशों को घिसते हैं तथा उनकी पुनःपूर्ति, भरपाई नहीं करते।

ऋतुचर्या के नियमों के अंतर्गत मुख्य रूप से आहार का चयन करना आवश्यक है, उसमें भी रस का चयन मुख्य है। तथा विहार पर ध्यान देना आवश्यक हैं। मुख्य बातों को संक्षिप्त रूप में व सूची रूप में यहाँ सम्मिलित किया गया है।

हेमंतवर्ष शिशिरेक्ष वायो: पितस्य तोयान्तनिदाधयोच्च। ककस्य कोष: कुसुभागमे स्यात् कुर्वीत यद्यद विहित तधैषाम्।।

(योगशतक)

 हेमंतऋतु (कार्तिक- मार्गशीर्ष) वर्षा (आषाढ – श्रवण)  तथा शिशिर (पौष – माघ) में वायु का प्रकोप होता है। शरद (भाद्रपद – आश्विन) तथा ग्रीष्म (वैशाख – ज्येष्ठ) में पित्त का प्रकोप होता है तथा वसंत (फाल्गुन – चैत्र) में कफ का प्रकोप होता है, इसलिये उस उस ऋतु में दोषों का निवारण करने वाली चर्या निश्चित करें।

शीतेऽग्न्यं वृष्टिधर्मेऽल्पं बलं मध्यं तु शेषयो।

शीत ऋतु (हेमंत तथा शिशिर) में मनुष्य का बल श्रेष्ठ होता है, बरसात तथा ग्रीष्म में न्यून बल होता है तथा शेष(शरद एवं वसंत) ऋतुओं में मध्यम बल होता है।

रसेजीतं जिते सर्वम्।

रस को जीत लिया तो सभी जीत लिया। आयुर्वेद में षडरस अर्थात ६ प्रकार के रस बताए गए हैं:

  1. मधुर ( मीठा)
  2. अम्ल ( खट्टा)
  3. लवण (नमकीन)
  4. कटु (चरपरा/तीखा)
  5. तिक्त (कड़वा, नीम जैसा)
  6. कषाय (कसैला/तूरा)

विभिन्न ऋतुओं में अलग-अलग रसों के सेवन की प्रधानता है। यह रस मुख्यतः उनके स्वाद के आधार पर बाटें गए हैं तथा भोजन के सभी पदार्थों में एक या एक से अधिक रस विद्यमान होते हैं।

हेमन्त – शिशिरचर्या :

  1. मधुर, अम्ल व लवण रस वाला, स्निग्ध, गुरु, उष्ण (गरम) तथा पर्याप्त आहार लें।
  2. प्रातः सरसों या तिल के तेल से अभ्यंग अर्थात मालिश करें तथा प्रातः काल सूर्य की कोमल धूप में बैठें।
  3. रात्रि में तथा प्रातःकाल अग्नि की आंच लें।
  4. गरम जल से नहायें।
  5. गरम, मोटे, पर्याप्त वस्त्र पहने।
  6. गरम बिछौना बिछाएं।
  7. ओढ़ने में भी गरम कपड़े ओढ़ें तथा
  8. घर में सोएं (बाहर न सोएं)।

वसन्तचर्या :

  1. तूरा या कषाय, कड़वे व तीखे रस वाला, हल्का, सूखा, कम तथा गरम आहार लें।
  2. प्रातः काल ठंड से बचें।
  3. दोपहर में धूप से बचें।
  4. दिन में ना सोएं।
  5. अधिक आराम ना करें तथा अत्याधिक कार्य भी ना करें।
  6. सैर के लिये और पर्यटन स्थलो आदि को घूमने न जाएँ और अधिक प्रवास न करें ।
  7. मालिश न करें।
  8. दही, बर्फ, गुड़, शक्कर, तिल तथा मिठाईओं का त्याग करें।

ग्रीष्मचर्या :

  1. मधुर, तूरा व कड़वे रस वाला, ठंडा, हल्का तथा प्रवाही आहार लें।
  2. ठंडे जल से स्नान करें।
  3. अनेक बार हाथ मुहँ धोएं।
  4. ज्यादा श्रम या व्यायाम न करें।
  5. ब्रह्मचर्य का पालन करें।
  6. ताप में न घूमें, अग्नि के पास अधिक न रहें।
  7. पैर, सर तथा आँखों को गर्मी न लगे इसका ध्यान रखना है।
  8. कम, पतले तथा सफेद वस्त्र पहने।
  9. दोपहर के समय आराम करें तथा
  10. रात को पर्याप्त नींद लें।

वर्षाचर्या :

  1. नमकीन, खट्टा/अम्ल रस वाला , चिकना, हल्का तथा मधुर आहार लें।
  2. कब्ज़ न होने दें।
  3. जठराग्नि का विशेष ध्यान रखें।
  4. नया जल तथा नए साकभाजी त्याग दें
  5. श्रम करें।
  6. संयमी रहें।
  7. विशेष व्यायाम ना करें।
  8. वायुकारी आहार ना लें।

शरदचर्या :

  1. कड़वा, तूरे रस वाला, हल्का तथा ठंड आहार लें।
  2. धूप मे ना घूमें।
  3. नंगे पैर या सिर से धूप में नहीं निकलना है।
  4. ठंडे जल से नहायें।
  5. जलाशय तथा कुदरती स्थानों के पास रहे।
  6. चाँदनी की शीतलता में घूमे।
  7. अधिक जागरण ना करे।
  8. दही, तिल, तेल, भीडी छाछ, आचार इत्यादि गरम, तीक्ष्ण या खट्टा तीखा नमकीन आहार अधिक ना लें।

चल रही ऋतु का अंतिम सप्ताह तथा अग्रिम ऋतु का पहला सप्ताह – ये चौदह दिन ऋतुसंधि कहे जाते हैं। इनमें पूर्व ऋतु की विधि (पूर्वाहार) क्रमशः छोड़नी चाहिए तथा आने वाली ऋतु की विधि (उत्तराहार) क्रमशः ग्रहण करनी चाहिए।

ऋतु के बदलने पर आहार मे परिवर्तन की यह विधि इस प्रकार है:

अचानक परिवर्तन करने पर असंतुलन से होने वाले रोग हो जाते हैं।

घी, आँवला, त्रिफला, मधु तथा दूध (सावन को छोड़कर) का सेवन सभी मास/ऋतुओं में किया जा सकता है।

ऋतुचर्या के अंतर्गत पालन योग्य एक मुख्य सिद्धांत है वर्तमान ऋतु में उत्पन्न हुए फल व शाक का सेवन करना। उसी प्रकार स्थानीय फल व शाक का सेवन करना। स्थान व ऋतु के वातावरण के अनुरूप ही प्रकृति खाने योग्य पदार्थों को उत्पन्न करती है। प्रत्येक प्रकार के वातावरण में जिन पोषक तत्वों की तथा जिन खनिजों की आवश्यकता होती है, उस स्थान के सभी प्राणियों के लिये नैसर्गिक प्रकृति वही उत्पन्न करती है, यह उसका एक मूलभूत वैज्ञानिक गुण है।  मनुष्य के लिये सभी से बड़ा सुख स्वास्थ्य है तथा प्रकृति के अनुरूप आचरण करने से ही स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है।

सूचन: यदि आप यह लेख-श्रृखंला एक साथ पढ़ना चाहें तो यहाँ तो पढ़ सकते हैं.

Feature Image Credit: youtube.com


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