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भगवद्‍गीता अभ्यास की प्रभावी विधि /भगवद्‍गीता कैसे पढ़ें

सारः आज के समय में प्रत्येक व्यक्ति इतना भाग्यशाली नहीं कि उसे गुरू का सानिध्य या उनके द्वारा ज्ञानप्राप्ति हो । ऐसे में,गुरु के अभाव में यदि कोई भगवद्‍गीता पढ़ना चाहता है तो वो कैसे पढ़े? यदि स्वाध्याय भी कर रहे हैं तो किस विधि और क्रम से करें तो वह प्रभावी हो और पूर्ण हो सके?

भगवद्‍गीता पढ़ने के इच्छुक लोग व्यापक रूप से ये अवरोध और प्रश्न अनुभव करते है। इन्हीं प्रश्नों का उत्तर देने के लिए इस लेख में भगवद्‍गीता अभ्यास की प्रभावी विधि पर प्रकाश डाला गया है।

यहाँ गीता शब्द के प्रयोग का अर्थ है- भगवद्‍गीता! वो गीता का संदेश जो महाभारत के युद्ध के पहले दिन, मार्गशीर्ष एकादशी को, युद्ध आरम्भ होने से पहले भगवान ने कृष्ण रूप में अर्जुन को कहा था। यह संदेश अथवा भगवद्‍गीता, महाभारत के भीष्म पर्व का भाग है। महामुनि व्यास ने आने वाले समय के अनुकूल उसे विभिन्न योगों में विभाजित किया तथा कालान्तर में गीता का एक स्वतन्त्र ग्रन्थ के रूप में अस्तित्व होने पर अध्यायों में पाठ संख्या का क्रम मुख्य हो गया।  भगवद्‍गीता, ब्रह्मसूत्र तथा उपनिषदों को सामूहिक रूप से प्रस्थानत्रयी कहा जाता है जो वेदान्त के तीन मुख्य स्तम्भ हैं। उपनिषदों की कई विद्याओं का उल्लेख व रहस्य, सांख्य दर्शन का सत, विभिन्न योग रूपी साधनों द्वारा व्यक्ति का कल्याण, आदि बहुत कुछ भगवद्‍गीता में मिलता है। इस कारण इसे जानने की उत्सुकता होती है और अभ्यासरत रहने पर जिज्ञासा जागृत हो जाती है। इस विषय पर सहायता करने के लिए अनेक पुस्तकें उपलब्ध है ।भगवद्‍गीता विश्व का सर्वाधिक अन्य भाषाओं में अनुवादित ग्रन्थ है। भारत में गीता प्रेस के विभिन्न संस्करण सर्वाधिक प्रचलित है।

पाठों का बन्धारण

गीता की अध्याय संख्या व उनके विषय इस प्रकार हैं :-

  1. पहला अध्याय –  अर्जुनविषादयोग
  2. दूसरा अध्याय -सांख्ययोग
  3. तीसराअध्याय – कर्मयोग
  4. चौथा अध्याय -ज्ञानकर्मसन्‍यासयोग
  5. पाँचवाँ अध्याय -कर्मसन्‍यासयोग
  6. छ्ठा अध्याय -आत्मसंयमयोग
  7. सातवाँ अध्याय -ज्ञानविज्ञानयोग
  8. आठवाँ अध्याय -अक्षरब्रह्मयोग
  9. नौवाँ अध्याय -राजविद्याराजगुह्ययोग
  10. दसवाँ अध्याय – विभूतियोग
  11. ग्यारहवाँ अध्याय -विश्वरूपदर्शनयोग
  12. बारहवाँ अध्याय -भक्तियोग
  13. तेरहवाँ अध्याय -क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभागयोग
  14. चौदहवाँ अध्याय -गुणत्रयविभागयोग
  15. पन्द्रहवाँ अध्याय -पुरुषोत्तमयोग
  16. सोलहवाँ अध्याय -दैवासुरसम्पद्विभागयोग
  17. सत्रहवाँ अध्याय -श्रद्धात्रयविभागयोग
  18. अठ्ठारहवाँ अध्याय -मोक्षसन्यासयोग

आधुनिक समय में व्यक्ति द्वारा गीता को पुस्तक जानकर उसे दी गई प्राथमिकता

आधुनिक समय में व्यक्ति की ज्ञान अर्जित करने की आकांक्षा अधिकतर अपने आप पढ़ने तक सीमित होती है जिसके लिए वह पुस्तकों को आधार स्तम्भ बना लेता है। शुद्ध शास्त्रीय ज्ञाता-विद्वान से ग्रहण करने के बजाय लोग आपस में चर्चा कर अपने अनुभव व मत-मतान्तर साझा करते हैं और भगवद्‍गीता जैसे सशक्त ग्रन्थ को भी एक प्रेरक पुस्तक की तरह, एक कॉफी टेबल पुस्तक की तरह पढ़ने के प्रयास करते रहते हैं। सही विधि के अभाव में ‘हिट एण्ड ट्रायल’ से पढ़ने का प्रयास करते है और अधिक आगे नहीं जा पाते। जैसे हम किसी भूल-भुलैया (मेज़) में जाये तो लक्ष्य तक पहुँचने के अनेक मार्ग जान पड़ते हैं, हम अपने अनुमान से एक मार्ग पर चल पड़ते हैं जो कुछ दूर जाकर बन्द हो जाता है। तो या तो उस अवरोध पर हम रुक जाते हैं या पुन: आरम्भ पर आते हैं। मार्ग जब तक सही नही होगा, लक्ष्य तक नही पहुँचेंगे। ऐसे में जानकार द्वारा सुझाये मार्ग पर चलने से उस लक्ष्य के सही मार्ग से आगे बढ़ते हैं। उसी प्रकार, गुरु द्वारा बतायी विधि से भगवद्‍गीता पढ़ने पर हम उसे जानने समझने के लक्ष्य की ओर बढ़ते हैं और अध्ययन कार्य को पूर्ण कर पाते है।

यह स्वीकारिता सबसे पहले लानी आवश्यक है कि स्वयं से गीता अध्ययन कठिन है। अठारह अध्यायों के शब्दार्थ तो पाठक किसी भी श्रेष्ठ सुझाई / जानी प्रणाली से पढ़ लेगा। – किन्तु पाठक को अधिक कुछ नहीं समझेगा।वह जिस दृष्टि से समझता है वो न तो पूर्ण है  न सक्षम लेकिन आज के समय का सत्य यही है कि अधिकतर व्यक्तियों के गुरु नहीं है न उस दिशा में कोई कार्य है। लेकिन गीता पढ़ने की, उसे जानने की इच्छा है तो ऐसे में व्यक्ति क्या करे?

गीताध्ययन की प्रभावी विधि

इसे जानने के लिए दो पक्षों को समझना आवश्यक है:

पहला पक्षगीता को पढ़ने और समझने के लिए निरन्तरता, दीर्घकालिता तथा सत्कार का व्रत

व्यक्ति सबसे पहले क्या पढ़े? इस प्रश्न का उत्तर इस पक्ष से मिलता है। पतञ्जलि योग सूत्र में बताते हैं-

अभ्यासवैराग्याभ्याम् तन्निरोधः॥१.१२॥ स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्काराऽऽसेवितो दृढभूमि:॥१.१४॥ जातिदेशकालसमयानवच्छिन्नाः सार्वभौमा महाव्रतम्॥२.३१॥

गीता अध्ययन के लिए इन तीन सूत्रों की प्रेरणा कुछ इस प्रकार होगी कि अभ्यास से चित्तवृत्तियों का निरोध होता है और बहुत समय तक निरन्तर और श्रद्धा के साथ सेवन किया हुआ वह अभ्यास दृढ़ अवस्था वाला हो जाता है और यह , सब अवस्थाओं में पालन करने योग्य महाव्रत है। अध्ययन साधना की यह साथन रूपी चाबी महर्षि पतञ्जलि ने उपलब्ध कराई हुई है।

निरन्तरता, नियमित रहने से आती है और नियमित रहने का सबसे प्रभावी साधन है उच्चारण अर्थात् गीता का नियमित रूप से वाणी द्वारा संस्कृत पाठ का स्पष्ट उच्चारण या आवृत्ति! हममें से कई को संस्कृत पढ़ना व उसका उच्चारण नहीं आता तो उसे सीखने का यही अवसर है। असंख्य व्यक्ति, समूह, संस्थाएँ ये कार्य प्रत्यक्ष तथा ऑनलाइन निःस्वार्थ रूप से कर रहे हैं। उनसे उच्चारण सरलता से सीखा जा सकता है।

उच्चारण सीखने से, आवृत्ति करने से नियमितता आती है, गीता के प्रति सहजता आती है, फलतः दृढ़ता आती है और व्यक्ति का विश्वास बढ़ता है कि वह कुछ जान रहा है। जैसे-जैसे उसका आत्मविश्वास बढ़ता है, वैसे वैसे उसके अर्थ की ओर व्यक्ति की जिज्ञासा बढ़ती है। इसमें एक अपेक्षा यह भी रहती है कि इससे वह साथ- साथ संस्कृत सीख रहा है। वह नहीं भी सीखे तो उच्चारण आदि सीखने से उसका गीता से परिचय बढ़ता है, उदाहरण के लिए- कितने अध्याय है, कौन सा अध्याय किस योग की बात करता है, कहाँ सर्वाधिक श्लोक हैं, आदि। अर्थात् गीता का मूलभूत परिचय उच्चारण सीखते सीखते हो जाता है।

सस्वर पाठ तथा कण्ठस्थीकरण ( याद करने) की सरलता के अनुसार पाठ क्रम:

गीता के अध्‍यायो का आवृति अथवा शब्दार्थ क को ध्यान में रखते हुए इस प्रकार क्रम रखा जाता है( यह सीखने या सिखाने वाले के अनुसार भिन्न भी हो सकता है) – पन्द्रहवाँ, बारहवाँ, सोलहवाँ, नौवाँ, दसवाँ, पहला, दूसरा, आठवाँ, छटा, तीसरा, चौथा, पाँचवाँ, सातवाँ, तेरहवाँ, चौदहवाँ, सत्रहवाँ, अठारहवाँ तथा ग्‍यारहवाँ।

इस क्रम का कारण अध्याय में श्लोकों की संख्या, उनका सरल उच्चारण, साधारण अर्थ की रोचकता, छन्दों की अथवा विभक्तियो आदि की एकरूपता, आदि होते हैं। गीता प्रेस की पुस्तकों में कण्ठस्थ करने के लिए श्लोक- आवृति और संख्या आदि स्मरण करने की कई युक्तियाँ दी गयी रहती है अथवा अनुभवीजन अन्य प्रभावी स्मरण युक्तियाँ बताते हैं।

छोटे बच्चे श्लोकों की बार -बार आवृति करें और बड़ी अवस्था वाले व्यक्ति श्लोकों के पदच्छेद और शब्दार्थ को ध्यान में लाकर फिर श्लोको की आवृत्ति करें तो श्लोक स्मरण होते चले जाते हैं। समूह पाठ करने से आयु जनित संकोच दूर होता है तथा उच्चारण की छोटी मोटी त्रुटि ठीक होती रहती हैं। लयबद्ध पाठ-आवर्तन आनन्दित करता है और भिन्न रागों में गाने पर व्यक्ति का मधुर मनोरजंन होता है। ऐसे धीरे- धीरे उसमें रस आने लगता है।

इसी सब में गीता के सही अर्थ को जानने की स्वाभाविक रूप से जिज्ञासा उत्पन्न होती है। गीता के प्रयोजन को जानने के लिए व्यक्ति सनद्ध होता है।

अर्थ और तत्व के अनुसार पाठ क्रम:

सही अर्थ में गीता के तत्व और प्रयोजन को जानने के लिए अध्ययन इस क्रम में किया जाना चाहिए। इस क्रम में भगवद्‍गीता के ज्ञाता अथवा गुरु और उनके अभाव में टीका , व्याख्या की सहायता से अर्थ ज्ञान प्राप्त करने ( श्रवण – मनन – निधि ध्यासन) का प्रयास वांछनीय है:

पहला, तीसरा, पाँचवा, सातवाँ, नौवाँ, ग्यारहवाँ, तेरहवाँ, पन्द्रहवाँ, सत्रहवाँ फिर दूसरा, चौथा, छठा, आठवाँ, दसवाँ, बारहवाँ, चौदहवाँ , सोलहवाँ और अठारहवाँ ।

इस क्रम के कारण को गुरु समझाता है तथा जिज्ञासु को आत्म ज्ञान तथा मोक्ष के पथ पर ले चलता है। ये पुस्तकों में लिखित नहीं मिल पाता है। आरम्भ विषाद से होता है और अंत मोक्ष में होता है।

तो सबसे पहले युद्ध और व्यक्ति का विषाद, फिर कर्म की चेतना , फिर कर्मसन्‍यास, फिर ज्ञान-विज्ञान फिर राजविद्या राजगुह्य की महिमा, पश्चात विश्वरूप दर्शन, फिर क्षेत्र क्षेत्रज्ञ का विभाग, पुरुषोत्तम का ज्ञान,उसके पश्चात परमात्मा के प्रति श्रद्धा के तीन विभागI

ऐसे पहले स्थितप्रज्ञ, फिर ब्रह्म की उपासना, फिर आत्म संयम योग, फिर आत्मा से ऊपर का अक्षर ब्रह्म का ज्ञान, फिर सर्वत्र ब्रह्म दर्शन ( विभूति योग) । उसके पश्चात भक्ति घटित होती है जिससे गुणत्रय से व्यक्ति अतीत होता है, फिर दैवी सम्पदा को प्राप्त करके मोक्ष सन्‍यास की प्राप्ति। मोक्ष से पहले क्या है तो दैवी सम्पदा है , इस माया को अतीत करके मोक्ष की प्राप्ति है। उससे पहले गुणातीत अवस्था है। गुणातीत अवस्था से पहले भक्ति है। उससे पहले ब्रह्म दर्शन है, उससे पहले अक्षर ब्रह्म को जानना है, उससे पहले आत्म संयम है। उसकी आवश्यकता क्यों है क्योंकि ब्रह्म की उपासना है फिर उस उपासना के लिए आदर्श स्थितप्रज्ञ होना है ( सांख्य योग) I

अब मन में ये प्रश्न उठता है कि पाठबद्ध तो व्यास जी ने किया तो उसी क्रम से पढा जाना चाहिए। तो यह समझने का विषय है कि आर्ष ग्रन्थ सूत्र रूपी होते हैं अर्थात कुछ व्यक्त होता है और कुछ अव्यक्त होता है और वह गुरू की चेष्टा से व जिज्ञासु की पात्रता से घटित होता है।अर्थ-क्रम से अध्ययन और उसका चित्त में धारण वास्तव में जिज्ञासु के आत्म विकास की यात्रा है। जिसकी परिणति मोक्ष में होकर भगवद्‍गीता का प्रयोजन सिद्ध होता है।

यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरःतत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम

जहाँ योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण हैं और जहाँ गाण्डीवधनुषधारी अर्जुन है, वहीं पर श्री, विजय, विभूति और अचल नीति हैऐसा मेरा ( संजय का) मत है॥

दूसरा पक्षअनुबन्ध चतुष्ट्य से गीता अध्ययन

व्यक्ति इस विधि से ही क्यों पढ़े? इस प्रश्न का उत्तर इस पक्ष से मिलता है। विषय, अधिकारी, सम्बन्ध, प्रयोजन – किसी बात को जानने के लिए ये चार मुख्य अनुबन्ध चतुष्टय कहलाते हैं । इन सब के मूल में है जिज्ञासा ।

गीता को पढ़ने की उत्सुकता का आरम्भ हमारे निजी स्वार्थ से होता है – गीता मेरी सहायता कैसे कर सकती है / गीता से मैं कैसे अधिक सफल हो सकता/ सकती हूँ ? गीता को जानना, पढ़ना शरीर के स्तर से होता है, पर कहने वाला गुरु शरीर से ऊपर होना चाहिए तभी तो वो शरीर से ऊपर की बात बता पायेगा। इसलिए जो भाष्य है, व्याख्या है , उसके अध्ययन की ये एक रीति है जो गुरु/ विद्वान के मार्गदर्शन में पालन करी जाती है। गीता है या दर्शन शास्त्र है, उसे पढ़ने या पढ़ाने की एक रीति आयी है वो रीति से पढेंगे तो वास्तविक अर्थ को जान पायेंगे, प्रयोजन को जान पायेंगे, उसके अधिकारी को जान पायेंगे, उसके सम्बन्ध को जान पायेंगे और इसके विषय को जान पायेंगे।

निरन्तरता, दीर्घकालिता और सत्कार के अभ्यास गुण तब तक नहीं आयेंगे जब तक व्यक्ति को प्यास नहीं लगेगी, उसे जिज्ञासा नहीं होगी। इसके लिए ब्रह्म सूत्र में बताया है कि सबसे पहले जिज्ञासा अर्थात् ब्रह्म जिज्ञासा आवश्यक है। जब तक जिज्ञासा नहीं तब तक आगे बढ़‌ना नहीं होगा। स्वाध्याय से ही आगे बढ़ेंगे तो कितने प्रश्न तो उठेंगे ही नहीं ।

अब जिज्ञासा कैसे आयेगी? जिज्ञासा वातावरण से आयेगी। तो वातावरण तैयार किया जाना चाहिये। भले ही गीता केकितने कोर्स कर लें, लेकिन वातावरण नहीं तो जिज्ञासा लगाना कठिन है। ये सर्वप्रथम है। ये व्यक्ति कई प्रकार से कर सकता है। नियमित पाठ करना इसका प्रभावशाली साधन है, उसे सत्संगति में करना और भी अच्छा।

अनुबन्ध चतुष्ट्य में पहला है विषय – विषय क्या है?जैसे विषय है ब्रह्म का प्रतिपादन करना , यदि ग्रन्थ में वो बात न आये तो वह ग्रन्थ उस विषय का नहीं कहा जायेगा।

दूसरा है विषय का अधिकारी अर्थात उसे ग्रहण करने के लिए कौन है? यहाँ जिज्ञासु अधिकारी है !

यदि कोई जिज्ञासु नहीं है तो स्पष्ट है कि वो नहीं ही समझ पायेगा। जब जिज्ञासा होती है तभी उसे पता चलता है इससे क्या होगा! जो अधिकारी नहीं है वो गीता समझ भी लेगा तो उसे प्रश्न आयेगा कि ये बात तो मैने जान ली लेकिन उससे क्या अन्तर पड़ा? इसे जानकर क्या होगा? पूरा भाष्य भी पढ लिया .जाये या गीता विद्यालय पाठ्‌यक्रम में भी आ जाये तो उसका अर्थ सब नहीं पढ सकेंगे क्योकि गीता को कोर्स में लाया जा सकता है, सबको अधिकारी नहीं बनाया जा सकता। शिक्षक भी पढ़ लेगा तो उसके मन में प्रश्न आयेगा कि मैंने पूरी गीता भी पढ ली किन्तु उससे मुझे क्या लाभ हुआ? जिज्ञासु होता तो उसे जो मिलता उसके बाद ये प्रश्न नहीं आता कि मुझे क्या मिला! भूखे को भोजन जाये तो वो सोचता है कितना अच्छा हो गया भोजन मिल गया। उसे बहुत महत्व की वस्तु मिली लगती है। उसके पास कुछ धन-सम्पत्ति नहीं है। किन्तु भूखे के पास तृप्ति है और ये जो तृप्ति है, वह भूख के कारण है, भोजन के कारण नहीं है। ऐसे ही जिज्ञासु को गीता के अध्ययन से जो प्राप्त होता है वह गीता के पढ़ने के कारण नहीं उसकी जिज्ञासा के कारण है।

अपने स्तर पर व्यक्ति कैसे पता लगा सकता है कि उसे केवल उत्सुकता है या जिज्ञासा है ? उसके प्रश्न पूछने से, विषय की, सीखने की तीव्रता से पता चलता है कि उसे जिज्ञासा है अथवा केवल उत्सुकता । उसे किस विषय में रस है? जैसे अध्यात्म में रस है तो उसे अध्यात्म की तत्व की जिज्ञासा है । लेकिन राजनीति में अथवा व्यवहारिकता में अथवा बाह्य वस्तुओं में रस है तो पता चलता है ये जिज्ञासा नहीं केवल उसकी उत्सुकता है। कुछ नया जानने की उत्सुकता स्वाभाविक होती है। जो हर किसी में हो सकती है। जिज्ञासा एक स्तर पर जाकर होती है, सबको नहीं होती है।

विषय, अधिकारी, फिर दोनों को सम्बन्ध – ग्रन्थ और विषय का, ग्रन्थ और अधिकारी का – जब तक नहीं बनता है तब तक वो पूर्णता नहीं आती है। विषय और ग्रन्थ का सम्बन्ध होना चाहिये। ऐसे ही ग्रन्थ और अधिकारी का सम्बन्ध होना चाहिये। जो कही गयी अधिकारिता रखता है वो अधिकारी है । गीता के सम्बन्ध में जिज्ञासु अधिकारी है। जिज्ञासा कब आती है? “तद्‌विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवये ” – प्रणिप्रात परिप्रश्न सेवा ये तीन जो करे वो अधिकारी है, अधिकारी को ज्ञान घटित होगा। जैसे आहार लेने के बाद रक्त बन जाता है ऐसा नहीं है। आहार लेने के बाद जो प्रकिया होती है (आहार को रस, रस के रक्त में परिवर्तित करने की ) वो होनी चाहिए, उससे रक्त बनता है केवल आहार से नहीं। केवल गीता सीखने की तैयारी से गीता नहीं आ जायेगी।

अधिकार प्राप्त करने के लिए क्या करना है? उसके लिए व्यक्ति को प्रयोजन सिद्ध करना है।उसका क्या प्रयोजन है? गीता का प्रयोजन क्या है, वह किस उद्देश्य से कही गयी? वो बनाई एक उद्देश्य से गयी – अर्जुन को सत्य और धर्म का भान करा कर युद्ध को सन्नद्ध करने के लिए, किन्तु प्रयोजन अलग ही था – मनुष्य को मोक्ष प्राप्ति तक ले जाना। गीता का उपयोग यदि अलग रीति से हो तो वो प्रयोजन सिद्ध नहीं होता है।

प्रयोजन यदि लौकिक है तो अध्यात्म ग्रन्थ का प्रयोजन चरित्रार्थ नहीं होता। लौकिक स्तर पर बहुत से स्थानो पर गीता बहुत सहायता करती है, ऐसे में ये समझ लेना है कि यह गीता का प्रयोजन नहीं है, उसका बाय- प्रोडक्ट है। बाय- प्रोडक्ट का प्रयोजन है कि उसका उपयोग ऐसा भी हो सकता है – जैसे अपने जीविका कमाने के क्षेत्र में गीता के माध्यम से कैसे सफल हों? ये गीता का प्रयोजन नहीं है।

गीता किस प्रयोजन से कही गयी ? तो विषाद से आरम्भ कर मोक्ष तक की यात्रा में जितने पड़ाव है, उनसे होते हुए मोक्ष कर्म या गुणातीत अवस्था को प्राप्त करना। जैसे-विषाद के बाद कर्म का पड़ाव है। कर्म के बाद कर्म सन्यास का पड़ाव है। वो अवस्था जब व्यक्ति कर्म विहीन हो सकता है, कर्म के बाद ज्ञान और विज्ञान की स्थिति आती है तो ज्ञान घटित होता है। ये ज्ञान केवल ज्ञान है, सूचना है या विद्या है? कहते हैं वो विद्या है और वो भी राज विद्या है तो राजविद्या- राजगुह्य योग की स्थिति आती है। राजविद्या घटित हो जाने पर विश्व का यथार्थ दर्शन होता है तो विश्व रूप दर्शन की स्थिति होती है। विश्वरूप दर्शन होने पर भक्ति घटित होती है । इस प्रकार आगे जाते हैं (ऊपर दिये अर्थ क्रम के अनुसार ) और अंततः मोक्ष की स्थिति या गुणातीत अवस्था प्राप्त होती है। व्यक्ति को गीता का यह प्रयोजन सिद्ध करना है, अन्य तो छोटे छोटे प्रयोजन हैं।

इस प्रकार अनुबन्ध चतुष्ट्य के माध्यम से पहले पक्ष में बतायी विधि का कारण स्पष्ट होता है।आधुनिक समय में गीता की सरल सुलभ पहुँच के लिए किये गये प्रयास इसी श्रेणी में आते हैं। किन्तु वह अनुबन्ध चतुष्ट्‌य का पालन नहीं करते हैं। ऐसे में पढ़ते तो सब है किन्तु आगे कम ही बढ़ पाते है। गीता और व्यक्ति का सम्बन्ध स्थापित करने के लिए लोगों को ऊपर नहीं उठा सकते हैं तो गीता को नीचे ले आते हैं। गुरु परम्परा में व्यक्ति को ऊपर उठाने की विधि है, गीता को नीचे लाने की विधि नहीं है।  गीता अपने स्तर पर है, उस तक व्यक्ति को जाना है।

उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि मनोरथै:। हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥

कार्य पुरुषार्थ से उद्यम करने से ही सिद्ध होते है, केवल इच्छा करने से नहीं I जैसे सोते हुए सिंह के मुख में हिरन स्वयं प्रवेश नहीं करते।

———- इति ——–

आभार:

संस्कृति आर्य गुरुकुलम् के आचार्य मेहुलभाई’ गुरुपरंपरा से शिक्षित दीक्षित गीता-दर्शन शास्त्री तथा षड्दर्शन शास्त्री हैं। उनकी ज्ञानप्राप्ति वाराणासी के ऋषितुल्य पं विश्वनाथ शास्त्री दातार जी से हुई है। इस लेख में प्रस्तुत विधि आचार्य जी द्वारा उद्घाटित है तथा उनकी अनुमति से लेखिका द्वारा यहाँ सार्वजनिक करी गयी है।

Feature Image Credit: wikimedia.org

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