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स्वस्थवृत्त- स्वस्थ रहने का एक उत्कृष्ट विचार भाग VII


२. रात्रिचर्या 

संध्या काल से रात्रि तक करने वाले सभी आचारों का रात्रिचर्या में वर्णन होता है।  रात्रिचर्या में निहित हैं :

  1. संध्या
  2. सांयकाल भोजन
  3. शयन व निद्रा
  4. शयन स्थान
  5. शयन/ रात्रि निद्रा की विधि
  6. शयन दिशा
  7. शयन की अवधि

संध्या-

ऋषयो दीर्घ संध्यत्वाद्दीर्घमायुर वाप्नुयु:।  प्रज्ञां यशश्च कीतिश्च ब्रह्मवर्चसमेव च।।

(मनुस्मृति)

संध्या काल में स्वस्थ व्यक्ति उपासना में स्वयं को तल्लीन करें। यहाँ उपासना का अर्थ जप तथा अभीष्ट देवताओं का अर्चन, दिन भर में अज्ञानवश जो  पापकर्म हो गए हों उनका प्रायश्चित, पूजन, अग्निहोत्र, आदि है।

यहाँ पुनः नित्यकर्म का उदाहरण लेते हैं-

नित्य उपासना से कैसे स्वास्थ्य बनाये रखने की युक्ति करी गयी है?

दिन में संधि काल अर्थात जिस समय दिन तथा रात मिलते हैं उस समय पर अधिकांश व्याधियाँ होती हैं, उस समय अधिकतर कीटाणु व रोगाणु उत्पन्न होते हैं जिससे शारीरिक तथा मानसिक दोनों स्थिति प्रभावित होती है। अतःदिन के दोनों संधिकाल सूर्योदय तथा सूर्यास्त समय संध्या का विधान है। संध्या द्वारा प्रायश्चित आदि की प्रक्रिया से मानसिक तथा वैचारिक शुद्धि होती है। अग्निहोत्र द्वारा वातावरण का निर्जन्तुकिकरण 10 होता है। संधि समय वायु की गुणवत्ता में बदलाव होने के कारण सर्वाधिक हानिकारण कीटाणु-जीवाणु उत्पन्न होते हैं। अग्निहोत्र से उत्पन्न गैस या वायुरूप द्रव्य इन कीटाणु-जीवाणु का नाश करते हैं या उन्हें उत्पन्न ही नहीं होने देते।

सायंकाल भोजनरात्रि के प्रथम पहर में लघु तथा सुपाच्य भोजन करना चाहिए। भोजन तथा शयन में तीन घंटे का अंतर होना चाहिए।

शयन व निद्रा – जागरण काल में मनुष्य निरंतर कार्यरत होने के कारण शारीरिक तथा मानसिक रूप से थक जाता है। इस थकान को दूर कर नयी शक्ति तथा स्फूर्ति प्राप्त करने का सहज साधन ‘शयन’ है। शरीर को स्वस्थ तथा सुरक्षित रखने के लिए भोजन की तरह नियमानुसार शयन करना आवश्यक है।

चरक का कथन है कि निद्रा के सम्यक् योग से शरीर में आरोग्य, पौष्टिकता, बल की वृद्धि, पौरुषशक्ति, समुचित ज्ञान तथा पूर्णायु  की प्राप्ति होती है। सम्यक निद्रा ना होने से शरीर में अनेक तरह के रोग, कृशता (पतलापन), निर्बलता, नपुंसकता एवं विषयों का सम्यक् ज्ञान ना होना आदि लक्षण होते हैं तथा जीवन का नाश हो जाता है।

सुश्रुत के कथनानुसार समय पर निद्रा का सेवन शरीर की पुष्टि तथा वर्ण, बल तथा उत्साह की वृद्धि करता है, अग्नि को बढ़ाता है, आलस्य को दूर करता है तथा धातुओं को साम्यावस्था में लाता है। प्राणी की सहज वृत्तियों (आहार, निद्रा, भय, मैथुन) में निद्रा की गणना है अतः नींद अनिवार्य है। अनिद्रा से पीडित व्यक्ति शारीरिक व मानसिक विश्रान्ति के अभाव में तनाव से भर शनैः शनैः मानसिक सन्तुलन खो बैठता है क्योंकि उसका स्नायुतन्त्र तथा प्रतिरक्षा तन्त्र क्षीण हो जाता है। ये मानसिक रोगों जैसे तनाव, अवसाद, चिंता, क्रोध और मनोवैज्ञानिक विकार की उत्पत्ति का कारण बनता है।

यही नहीं भोजन के सुपाचन के लिए भी अच्छी नींद जरूरी है। निद्रा हेतु रात्रि तथा जागरण हेतु दिन का विभाजन प्राकृतिक रूप से हमें प्राप्त है। शिशु तथा रोगी तथा कुछ एक अवस्था के व्यक्तियों को छोड़कर दिन में शयन निषेध बताया गया है क्योंकि दिन में शयन से कफ, आलस्य तथा जड़ता बढ़ती है एवं आयु क्षीण होती है। इसके विपरीत आजकल व्यक्ति रात्रि में शयन से पहले अधिकतर वह कार्य करता है जो विचलित करने वाले, मन तथा विचार  को अस्थिर करने वाले तथा श्वास आदि में  व्यवधान उत्पन्न करने वाले होते हैं।

उदाहरण के लिये शयन से पहले विश्व/राजनीति आदि के समाचार, सिनेमा, धारावाहिक आदि टेलिविज़न पर देखना; शांति के स्थान पर उद्विग्नता उत्पन्न करने वाला साहित्य/उपन्यास आदि पढ़ना; मौन धारण तथा चिंतन के स्थान पर दिन भर की आवश्यक-अनावश्यक  बातें करना, तर्क-वितर्क  करना; देर से तथा गुरु अर्थात पचने में भारी भोजन करना; देर से शयन; कृत्रिम रूप से वातानुकूलित वायु में शयन, आदि। यदि ऐसा ही नित्य कर्म हो तो ये सभी करते समय इतना स्मरण रखना है कि यह सभी कार्य व गतिविधि हमारे स्वास्थ्य के प्रतिकूल है तथा हमें स्वस्थ रखने में सहायक नहीं है। यह सभी धीरे-धीरे हमारी धातुओं को घिसकर उनका नाश करते हैं। फलस्वरूप वृद्धावस्था अधिक संवेदनशील होती है तथा रोगों से भरी रहती है।

शयन स्थान

  1. शयन स्थल शांत तथा स्वच्छ हो।
  2. शय्या की लंबाई-चौड़ाई पर्याप्त हो।
  3. शय्या कोमल व सुखप्रद हो।
  4. पलंग जानुतुल्य अर्थात घुटने तक की ऊँचाई वाला हो।
  5. शय्या टेढ़ा-मेढ़ा न हो।
  6. तकिये से युक्त अच्छे गद्दे पर चादर बिछाकर सुखपूर्वक शयन करना चाहिये।

शयन/ रात्रि निद्रा की विधि  मनु ने शयन-विधि का वर्णन करते हुए कहा है कि शयन के पूर्व मुखशुद्धि करके कवोष्ण दुग्धपान करके, मूत्र-त्याग कर हाथ-पैर अच्छी तरह धोकर उन्हें वस्त्र से सुखाकर इष्टदेवता का स्मरण करते हुए शयन चाहिये। शयन करते समय, सोते से पहले अपने को सम अवस्था में लाना चाहिए। वह सम अवस्था इस प्रकार आती है :-

निशि स्वस्थ मनास्तिष्ठेन्मौनी दण्डी सहायवान्। एवं दिनानि मे यान्तु चिंतयेदिति सर्वदा।

रात्रि चर्या में शयन से पूर्व,,मन को सभी चिंताओं से दूर रखते हुए स्वस्थ व्यक्ति मौन धारण कर धर्म चिंतन करते हुए, दिनभर के क्रियाकलापों का गुण-दोष पूर्वक विचार कर ध्यान करें कि शेष दिन भी इसी प्रकार सुखपूर्वक व्यतीत हों।

शयन की दिशा – आयुर्वेद के ग्रंथ तथा शास्त्र पूर्व अथवा दक्षिण दिशा की ओर सिर करके शयन का निर्देश देते हैं। इसके विपरीत होने पर व्यक्ति रोगग्रस्त हो जाता है। याज्ञवल्क्य ने भी पश्चिमदिशा की ओर सिर ना करके शयन का निर्देश दिया है। यह शास्त्रीय निर्देश भी वैज्ञानिक है। भौतिक विज्ञान के अनुसार प्रत्येक पिण्ड में एक चुम्बकीय शक्ति होती है। इस पृथ्वी पिण्ड की भी चुम्बकीय शक्ति के दोनों सिरे उत्तरी ध्रुव तथा दक्षिणी ध्रुव हैं। अतः पृथ्वी के अन्दर की विद्युद्धारा का प्रवाह दक्षिण दिशा से उत्तर की ओर है। दूसरे, चुम्बक का गुण है कि उसके समान ध्रुव एक दूसरे को विपरीत दिशा में धकेलते हैं तथा विपरीत ध्रुव परस्पर आकर्षित होते हैं।

मनुष्य के शरीर में उसके सिर की ओर उत्तरी ध्रुव तथा पैर दक्षिण ध्रुव हैं। अतः उत्तर की ओर सिर करके शयन पर पृथ्वी तथा मनुष्य के समान ध्रुव परस्पर विपरीत प्रभाव डालेगें। पृथ्वी की अपार चुम्बकीय शक्ति का विपरीत प्रभाव शरीर के नगण्य चुम्बकत्व पर पड़ने से शारीरिक क्रियाशक्ति क्षीण होगी तथा पार्थिव विद्युत् भी दक्षिण ध्रुव वाले पैरों से होकर सिर की ओर प्रवाहित हो शिरोवेदना (सिरदर्द) या स्नायुपुञ्जों में अस्वाभाविक उत्तेजना बढ़ा देगी। इसके विपरीत शयन पर विद्युत् सिर से पैरों की ओर जायेगी, जो स्वाभाविक है। यदि कोई व्यक्ति दक्षिण की ओर पैर करके सोता हो तो निद्रा के अशांत होने की अत्यधिक संभावना रहती है, ऐसा व्यक्ति यदि एक सप्ताह भी दिशा परिवर्तन कर दक्षिण की ओर सिर करके सोये तो उसे अपनी निद्रा की गुणवत्ता में अंतर अनुभव होगा। यदि कोई अन्य रोग नहीं है, तो नींद शांत तथा बिना बाधा के आने लगेगी।

इसी प्रकार सूर्य की प्राणमयी शक्ति भी पूर्व से पश्चिम की ओर प्रवाहित होती है। अतः पश्चिम की ओर सिर करके शयन से भी मस्तिष्क तथा स्नायुमण्डल में व्यथा उत्पन्न होती है।

शयन की अवधि – दक्षस्मृति के अनुसार रात्रि के प्रारंभ का समय तथा रात्रि के अंत के समय (ब्रह्ममुहूर्त) में वेदाभ्यास का निर्देश है तथा शेष दो प्रहर अर्थात छह घंटे शयन करना चाहिए, ऐसा बताया गया है। एक स्वस्थ व्यक्ति के लिए छह से सात घंटे की नींद पर्याप्त होती है। यदि इससे अधिक शयन पर भी नींद, थकान या सुस्ती लगती है तो या तो शरीर में कोई रोग है या तमोगुण अधिक मात्रा में है।

सूचन: यदि आप यह लेख-श्रृखंला एक साथ पढ़ना चाहें तो यहाँ तो पढ़ सकते हैं.

Feature Image Credit:picxy.com


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