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स्वस्थवृत्त- स्वस्थ रहने का एक उत्कृष्ट विचार भाग VI


किन नियमों तथा क्रियाओं के पालन द्वारा हम स्वस्थ रह सकते हैं?

व्यक्तिगत अथवा वैयक्तिक स्वस्थवृत्त के तीन स्तंभ हैं – दिनचर्या, रात्रिचर्या तथा ऋतुचर्या जिन्हें आम भाषा में आजकल लाइफ-स्टाइल तथा ईटिंग-हैबिट्स के रूप में समझा जाता है। सर्वप्रथम हमें अपनी लाइफ-स्टाइल तथा ईटिंग-हैबिट्स की तुलना स्वस्थवृत्त की दिनचर्या-रात्रिचर्या-ऋतुचर्या से करनी चाहिए तथा देखना चाहिए कि इनमे क्या समानता तथा भिन्नता है। हमें अपनी स्वास्थ्य की अवस्था के अनेक कारण स्वयं ही समझ आ जाएंगे।

स्वस्थ वृत्त को समझने के पश्चात अब उसके उन नियमों को जानना चाहिए जो त्रि-स्वास्थ्य की कुंजी हैं, चाबी हैं। दिनचर्या, रात्रिचर्या तथा ऋतुचर्या में वह सभी क्रियाएं निहित हैं जिनसे हम स्वस्थ रह सकते हैं।

प्रकृति की दो विशेषताएं हैं – प्रथम, प्रकृति की प्रत्येक क्रिया नियमित है, कुछ भी अकस्मात नहीं होता। द्वितीय, प्रकृति सतत परिवर्तनशील है तथा चलायमान है। खनिज तथा वातावरण से ले कर मनुष्य तक सृष्टि की प्रत्येक वस्तु में परिवर्तन होता है। उसी परिवर्तन व नियमितता के साथ संतुलन बनाकर व्यक्ति स्वस्थ रह सकता है। इस संतुलन को बनाए रखने के लिये दिनचर्या, रात्रिचर्या व ऋतुचर्या का वृत्त है।

दिनचर्यां निशाचर्यां ऋतुचर्यां यथोदितम्। आचारान् पुरुषः स्वस्थ: सदा तिष्ठति नान्यथा।।

(भाव प्र. 513)

 अर्थात स्वस्थ व्यक्ति दिनचर्या, रात्रिचर्या तथा ऋतुचर्या का उसी प्रकार पालन करें जिस प्रकार शास्त्रों में वर्णित किया गया है। इसका आचरण करने से मनुष्य सदा स्वस्थ रहता है, उसके विपरीत आचरण करने से रोग से ग्रस्त हो जाता है।

१ .दिनचर्या 

अष्टांग हृदय में वाग्भट्ट बताते हैं –

उभयलोकहितमाहारविहारचेष्टितामिति यावत् प्रतिदिने यतकर्तव्यम्। (अष्टांग ह. सू 21)

चर्या का अर्थ है चरण (आचरण), प्रतिदिन करने योग्य, प्रतिदिन की चर्या का नाम दिनचर्या है।

उसी प्रकार सुश्रुत का निर्देश है –

उत्थायोत्थाय सततं स्वस्थेनारोग्यमिच्छिता। धीमता यदनुष्ठेयं तत्सर्वं सम्प्रवक्ष्यते।। (सु. चि. 233)

आरोग्य की कामना करने वाले धीमान् व्यक्ति को दिनचर्या में वर्णित कार्यों को प्रतिदिन करना चाहिए। दिनचर्या में क्या कर्तव्य हैं, इन्हे करने के क्या लाभ हैं तथा ना करने से क्या हानि है, यह भावप्रकाश ग्रंथ में भी विस्तार से वर्णित है।

दिनचर्या में आने वाले कर्तव्य इस प्रकार हैं (कार्य जो नियमित रूप से करने चाहियें):

1. ब्रह्मुहूर्त जागरण – सूर्योदय से दो घड़ी पहले जागरण।

निष्कर्ष- सूर्योदय से पहले उठना। प्रातः काल का सर्वप्रथम भाव कृतज्ञता का होना चाहिए, इसलिये  जगते ही सर्वप्रथम प्रातःमंत्र का निर्देश है।

कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले तु गोविन्दः प्रभाते करदर्शनम् ॥ 

ईश्वर का नित्य वंदन कृतज्ञता के भाव का पोषण करता है तथा उसे धीरे-धीरे संस्कार में परिवर्तित करता है।

2. उषापान: सूर्योदय से पहले खाली पेट जल ग्रहण करना।

ये जल तब पीना जब पिछली रात्रि हल्का सात्विक भोजन करने के तीन घंटे पश्चात सोएँ हों। जैसे पिछली रात यदि सात बजे तक हल्का सात्विक भोजन लिया और दस बजे सोये हैं तो उषापान कर सकते हैं, किंतु यदि पिछली रात नौ बजे भोजन लिया, भारी भोजन लिया और दस बजे सोये हैं तो उषापान नहीं करना है। (सूर्योदय के पश्चात जल ना  पीना क्योंकि ये अग्नि को मंद करता है और लाभ के स्थान पर हानि करता है)

3. मलत्याग – पेट साफ करना

4. आचमन – मुख प्रक्षालन, कुल्ला करना

5. दंत धावन – दाँत साफ करना

6. जिह्वनिर्लेखन – जीभ साफ करना

7. मुख व नेत्र प्रक्षालन – आँखें तथा मुँह धोना

8. अञ्जन कर्म – आँखों में अञ्जन

9. नस्य कर्म: नाक में नस्य डालना/ नाक की सफाई करना

10. कवल-गणडूष – औषधियुक्त द्रव्य से कुल्ला करना

11 धूमपान – धूप के धुएँ का सेवन करना (सिगरेट पीना नहीं)

12.ताम्बूल सेवन – नागरवेल के पत्ते पर औषधि के कुछ घटक डालकर पान का सेवन करना (तंबाकू वाला/ लज़ीज़ पान नहीं)

13. अभ्यंग – तेल मालिश

14. व्यायाम – अर्ध शक्ति व्यायाम करना। अति व्यायाम न करना

15. उद्वर्तन – उबटन लगाना, कड़वे आदि रसयुक्त द्रव्यों के चूर्ण को शरीर पर रगड़ना

16. स्नान – ऊपर से नीचे की ओर जल डालकर नहाना (पहले सिर, फिर कंधे, अंत में पाँव, यथा)। सिर गरम जल से न धोना तथा ज्वर एवं ऋतुस्राव 9 में स्नान न करना।

17. अनुलेपन – औषधीय द्रव्यों के चूर्ण का लेपन अर्थात आयुर्वेदिक पाउडर लगाना

 18. वस्त्रधारण – ऋतु के अनुकूल तथा स्वच्छ (नित्य धुले हुए) वस्त्र पहनना

प्रकृति के पंचामृत यानि आकाश,वायु, जल, प्रकाश(अग्नि), भूमि – यह प्रातः काल में ही स्वच्छ एवं प्रदूषण रहित अवस्था मिलते हैं। समस्त ब्रह्माण्ड में सूर्य ही प्राणस्वरूप तथा शक्ति का निधान है अतः जब तक सूर्य-शक्ति पृथ्वी पर विद्यमान हो अर्थात दिन में, तब तक जाग्रता अवस्था से सूर्य के साथ सम्पर्क रखने से जीव के क्षुद्र प्राण में सूर्य का महाप्राण सञ्चरित होता है तथा जीव पुष्टप्राण तथा दीर्घायु होता है।

सूचन: यदि आप यह लेख-श्रृखंला एक साथ पढ़ना चाहें तो यहाँ तो पढ़ सकते हैं.


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