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सुता चली ससुराल! – भाग ३

विवाह

‘सुता चली ससुराल’ के पूर्व भाग में आप पढ़ चुके हैं कि नर और नारी की रचना में क्या अंतर है। आइये इस चर्चा को आगे बढ़ाते हैं ।

‘स्थिरत्व’ स्त्री का प्राकृतिक गुण है (रज प्रधानता के कारण)। वह एक स्थिति या परिस्थिति में लंबे समय तक रह सकती है। पुरुष का प्राकृतिक गुण महत्वाकांक्षा है (सत गुण, अहंकार प्रधान होने के कारण), इस कारण वह एक स्थिति या परिस्थिति में अधिक समय तक नहीं रह सकता। ऐसे में पूर्णतया अनुकूल न होने पर भी नए स्थान पर रह पाना स्त्री के लिए सहज है, पुरुष के लिए कठिन है। एक पुरुष (पिता) की इच्छा (उसकी जड़ता) के लिए दूसरा पुरुष लंबे समय तक अनुकूल न होने पर अथवा निज जड़ता के कारण, लंबे समय तक उस स्थिति में सहजता से नहीं रह पायेगा। जबकि स्त्री दूसरी (वरिष्ठ) स्त्री के उपस्थिति व सत्ता में अपने भावुकता, आश्रितता व स्थिरत्व के प्राकृतिक गुण के कारण लंबे समय तक पूर्णतया अनुकूल न होने पर भी उस स्थिति में रह पाएगी।

स्थिरत्व के गुण के अभाव के कारण पुरुष पारिवारिक संरचना में आत्म-वश्य, संचालनीय (self-manageable) बहुत कम होता है, ऐसे में स्त्री का उसके परिवार के संचालन के लिए उसके घर आना प्रायोगिक, वांछनीय है। स्थिरत्व, बुद्धि-बल (युक्ति-बल, काल-बल, व सहज-बल) के जो अवयव व्यवहार बल कहलाते हैं उसकी मात्रा स्त्री में कहीं अधिक है। गृह व्यवस्था का निर्वहन स्त्री सुलभ है। उस गृह की स्वामिनी होने का भाव उसके लिए आवश्यक है। अपने पिता के घर में गृहस्वामिनी का भाव आने की संभावना नहीं या अति क्षीण है।

एक कही गई बात तर्कसंगत लगती है कि  मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने भी स्त्री (अपनी पत्नी) के परिग्रह में रहने पर उन्हें कटु वचन कहे और अपने चरित्र की विशुद्धि की सफाई सीता को देनी पड़ी । तो क्या एक सामान्य कलियुगी नर मानव से अपेक्षा करी जा सकती है कि वह अन्य घर में (अपने पिता के घर में) रहने वाली अपनी पत्नी पर किसी प्रकार का अनुचित लांछन नहीं लगाता रहेगा? गृहस्थी की शांति के लिए सामान्य अवस्था में भी स्त्री के अपने पति के घर में रहने की व्यवस्था की परंपरा ही चली और रही भी। स्त्री का एक नाम ‘योषा’ है अर्थात जो पुरुष को अपने साथ जुटाती है।

ऐसे ही स्त्री का एक नाम ‘मानिनी’ है। अर्थ विस्तृत है। स्त्री मानप्रिय है, रूठने पर मनाए जाने की आकांक्षा वाली है । उसमें स्वाभिमान व आत्मसम्मान की भावना तीव्र होती है और साथ ही साथ अपनत्व की भावना भी।

समाज में पतनसूचक आये दो परिवर्तन इस संदर्भ में ध्यान देने योग्य हैं।  पहला – चार प्रकार के बल में पुरुष में अर्थ-बल और काम-बल( पौरुषत्व, कर्म को सिद्ध करने की शारीरिक क्षमता) स्त्री की अपेक्षा अधिक होने पर उसने संरक्षक व पोषक की भूमिका को अर्थ-बल के कारण अधिकार व स्वामित्व मान लेना आरम्भ किया और काम-बल का स्त्री के भावुक व आश्रित- सहज-प्रेरित/प्राकृतिक गुणों का दमन करने के लिए प्रयोग करना आरम्भ किया। फलस्वरूप अन्य दो बलों (बुद्धि-बल/व्यवहार-बल व प्रतिकार-बल) को हीन और अर्थ-बल व काम-बल को श्रेष्ठ मानने लगा।

दूसरा-  स्त्री की आश्रितता के मूलभूत गुण को ठेस लगने से और आत्मसम्मान व स्वाभिमान की भावना तीव्र होने से, उसने अपने को इन दोनों बलों अर्थात अर्थ-बल व काम-बल को विशेष पुरुषार्थ कर सशक्त करना आरम्भ कर दिया जिसका रूप हम आज के समय में जीविका-उपार्जन/धन-उपार्जन में कार्यरत स्त्रियों के रूप में देखते हैं। अपने काम-बल को अधिक दृढ़ करते-करते उसका पुरुषार्थ करते-करते आज वह हर उस क्षेत्र में कार्य करने को तुली है जहाँ स्वाभाविक शारीरिक बल ही अधिक चाहिए होता है और इसे जेंडर इक्वलिटी (gender equality) का सिद्धांत बना दिया गया है। इसका सीधा दुष्प्रभाव उसके शारीरिक आंतरिक अंगों, मन: स्थिति और गृहस्थी पर पड़ता है।

Image credit: picxy 

 

 


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