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महाकाव्य के नियम

वैसे तो वाल्मीकि रामायण का आरंभ ही “मा निषाद…” वाले श्लोक से माना जाता है, लेकिन असल में उससे पहले ही नारद संक्षेप में ऋषि वाल्मीकि को श्री राम के बारे में बता रहे होते हैं। क्रौंच पक्षी वाली घटना इसके तुरंत बाद होती है, इसलिए वो दूसरे सर्ग में है और पहले सर्ग में नारद मुनि से ऋषि वाल्मीकि की बात-चीत है। फिर ये श्लोक महत्वपूर्ण कैसे हो जाता है? ये श्लोक इसलिए महत्वपूर्ण होता है क्योंकि वाल्मीकि को आदिकवि माना जाता है और इस श्लोक को उनका रचा हुआ पहला श्लोक मानते हैं –

मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः ।
यत्क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः काममोहितम् ।।
(वाल्मीकि रामायण – 1- 2-15)

ये अनुष्टुप छंद में है और पहला श्लोक ही चूँकि अनुष्टुप छंद में रचा गया था, इसलिए कई बार श्लोक और अनुष्टुप छंद को पर्यायवाची की तरह भी प्रयोग में लाया जाता है। अनुष्टुप को न तो पूरी तरह मात्रिक छंद माना जाता है, न ही वार्णिक। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट हो जाता है, मात्रिक छंद में मात्राओं की गिनती का ध्यान रखा जाएगा और वार्णिक में वर्णों की गिनती का अधिक ध्यान रखते हैं। अनुष्टुप छंद में जो चार चरण होते हैं, उन सभी में आठ-आठ वर्ण होते हैं। हर चरण के बाद यति यानी एक छोटा सा विराम लिया जाता है।

वाल्मीकि रामायण के बदले रामचरितमानस उठा लें तो वहाँ भी पहला श्लोक इसी अनुष्टुप छंद में मिल जायेगा –

वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि ।
मंगलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ ॥1॥

सिर्फ एक गुण, आठ वर्णों का एक चरण होना भर पता हो तो अनुष्टुप छंद पहचाना जा सकता है। और विस्तार जैसे कि प्रत्येक चरण में पाँचवा वर्ण लघु और छठा वर्ण गुरु होगा, या फिर पहले और तीसरे चरण में सातवाँ वर्ण गुरु होगा, या दूसरे और चौथे चरण में सातवाँ वर्ण लघु होगा, इन नियमों का पता न भी हो तो भी अनुष्टुप छंद होगा, ऐसा अनुमान लगाया जा सकता है। जैसे ही इसकी तुलना दूसरे श्लोकों से करेंगे तो दूसरे छंद भी दिख जाते हैं। जैसे बालकाण्ड के ही मंगलाचरण में जब सातवाँ पद देखें –

नाना पुराण निगमागम सम्मतं यद्
रामायणे निगदितं क्वचि दन्यतोअपि ।
स्वान्त: सुखाय तुलसी रघुनाथ गाथा
भाषा निबंध मति मंजुल मातनोति ।।7।।

इतने लम्बे-लम्बे चरणों में आठ वर्ण तो होंगे नहीं, इसमें चौदह वर्ण हैं। इसे वसन्ततिलका छंद कहा जाता है जिसमें चौदह वर्णों का एक चरण होता है लेकिन यति इसमें भी आठ वर्णों के बाद ही होती है। इसलिए गायन में अधिक अंतर नहीं दिखेगा।

सिर्फ दो-तीन श्लोकों और छंदों को देखने पर अनुमान हो गया होगा कि वर्णों और मात्राओं के क्रम में पूरी तरह सही भी हो, और फिर अर्थ भी निकलता हो, ऐसे एक श्लोक की रचना कितनी कठिन है। हिन्दी में जो आजकल बेतुकांत कविता दिखती है, उसका एक बड़ा कारण यही है कि छंद-वर्णों का उचित प्रयोग सीख लें और उसके बाद कविता लिखें, ये बड़ा मुश्किल है। एक पैराग्राफ लिखकर जहाँ-तहाँ इंटर मार कर उसे कविता घोषित कर देना कहीं आसान काम है। उर्दू में भी शेरो-शायरी में, गजलों में इसी तरह नियम याद रखने पड़ते हैं, इसलिए वो भी मुश्किल हो जाता है।

इसके बाद महाकाव्य के नियम आते हैं। भामह ने काव्यालंकार में, दण्डी ने काव्यादर्श में, यहाँ तक कि अग्निपुराण में भी महाकाव्य के लक्षण मिल जाते हैं। अक्सर संस्कृत के शास्त्री-आचार्य आदि के पाठ्यक्रम में जो आचार्य विश्वनाथ रचित साहित्यदर्पण होता है, उसमें विस्तार से महाकाव्य के लक्षण बताये हुए हैं। सबसे पहला होगा कि महाकाव्य सर्गों में बनता होगा और कमसेकम आठ सर्ग होंगे। इसमें नायक देवता, क्षत्रिय या कुलीन होंगे। एक ही प्रधान रस होगा और उसमें भी तीन ही रस – शृङ्गार, वीर और शान्त रस में से कोई एक होगा। बाकी के रस सहायक हो सकते हैं, प्रधान नहीं होंगे। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, इन चारों का वर्णन होगा, एक भी घटा तो वो महाकाव्य ही नहीं रह जायेगा। प्रत्येक सर्ग में एक ही छन्द वाले पद्य रहेंगे लेकिन अन्त में छन्द परिवर्तन हो जाता है। महाकाव्य में प्रातः, दिन, मध्याह्न, संध्या और रात्रि का वर्णन होता है। युद्ध, प्रस्थान, ऋतुओं का वन का और मृगया यानि शिकार का वर्णन भी होगा।

आपकी भावना इसलिए आहत हो रही है क्योंकि आपने याद नहीं रखा कि महाकाव्य में सिर्फ धर्म और मोक्ष नहीं होगा, उनमें काम और अर्थ की चर्चा भी होगी। सर्ग के अंत में छंदों का बदलना भी आसानी से पहचाना जा सकता है। ये नियम ही है, इसलिए छंद अलग था तो किसी और ने लिखा होगा, ऐसा नहीं कहा जा सकता। श्लोकों के नियम से ये अनुमान हो गया होगा कि एक-एक श्लोक लिखना ही घंटों का श्रम होगा। इतने श्रम के बाद अगर आपको यश भी न मिले (धन तो नहीं ही मिल रहा) तो आप ये करेंगे क्यों? पूरे पूरे सर्ग एक छंद में लिखकर अंतिम के छंद बदलकर पूरा सर्ग बनाया और बिना धन या यश की कामना के उसे किसी और की लिखी पुस्तक में जोड़ दिया? बड़े विचित्र जीव हो! ऐसा कोई मनुष्य तो आजकल देखने-सुनने में नहीं आता।

संस्कृत ग्रंथों में रचना की विशेषताओं को समझना हो तो काव्य ग्रंथों के साथ साथ काव्य लक्षण के ग्रन्थ भी पढ़ने पड़ते हैं। साहित्यालोचना के दो प्रमुख संस्कृत ग्रन्थ काव्यप्रकाश (आचार्य मम्मट) और साहित्य दर्पण (आचार्य विश्वनाथ) आसानी से हिंदी अनुवाद के साथ उपलब्ध हैं। अगर इतनी मोटी किताबें न भी पढ़ पायें तो साहित्यालोचन (डॉ. श्यामसुंदर दास) पढ़ सकते हैं। इनके बिना अपना मनमाना अर्थ या विश्लेषण लेकर आप आयें, या किसी और का किया हुआ अनुवाद लेकर आयें तो वो कुछ वैसा ही होगा जैसे ये कहना कि मैंने यू-ट्यूब पर ये सर्जरी या इस एक्सपेरिमेंट के वीडियो दस-बीस या पचास बार देखे हैं इसलिए इसके बारे में मैं बात कर सकता हूँ। बाकी स्वयं पढ़कर देखिये, किसी और ने उसे पढ़कर क्या समझा, ऐसे सेकंड हैण्ड ज्ञान पर स्वयं को ज्ञानी समझ लेना कोई समझदारी तो नहीं होती

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