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स्वस्थवृत्त- स्वस्थ रहने का एक उत्कृष्ट विचार भाग XIV


आहार विधि-विधान

चरक ने आहार के आठ विधानों का या आठ भावों का वर्णन किया है तथा इसी प्रकार वाग्भट्ट ने सप्त आहार की कल्पना की है। आहार का हित या अहित इन पर निर्भर करता है। इन विधानों का सम्यक रूप से पालन करने पर शरीर को लाभ मिलता है, वहीं असम्यक रूप से पालन करने पर शरीर को हानि होती है।

ये अष्टायतन हैं –

  1. प्रकृति,
  2. करण(संस्कार),
  3. संयोग,
  4. राशि(मात्रा),
  5. देश,
  6. काल (समय),
  7. उपयोक्त (आहार का सेवन करने वाला) तथा
  8. उपयोग संस्था ! आहार को उपयोग करने के नियमों को उपयोग संस्था कहा जाता है।

आहार के उपयोग नियमों तथा आहार-रस-क्रम को आहार विधि-विधान कहा है। इसका वर्णन चरक संहिता में किया गया है:-

तत्रेदमाहारविधिविधानमरोगाणामातुराणां चापि केषाञ्चित् काले प्रकृत्यैव हिततमं भुञ्जानानां भवति-उष्णं स्निग्धं मात्रावत् जीर्णे वीर्याविरुद्धं इष्टदेशे इष्टसर्वोपकरणं नातिद्रुतं नाति विलंबितं अजल्पन् अहसन् तन्मना भुन्जीत आत्मनभिसमीक्ष्य सम्यक्।।

(च. स. वि. १/२४)

ये आहार के उपयोग नियम हैं।

  • उष्ण अर्थात गरम आहार का सेवन करें
  • स्निग्ध आहार का सेवन करें
  • मात्रा पूर्वक आहार लें
  • जीर्ण होने पर यानि पहले का खाया हुआ पूरी तरह पचने के पश्चात ही भोजन करें
  • वीर्य विरुद्ध, कार्य विरुद्ध भोजन न करें। उदाहरण: पका हुआ तथा कच्चा भोजन एक साथ लेना वीर्य विरुद्ध भोजन है।
  • मन के अनुकूल स्थान तथा मन के अनुकूल सामग्री का सेवन करें। जैसे किसी स्थान पर अत्यधिक गर्मी/सर्दी लग रही हो या अधिक गीला हो तो वह स्थान मन के अनुकूल नहीं है।
  • अति शीघ्रता तथा अत्यधिक धीरे-धीरे भोजन ना करें।
  • बातें ना करते हुए तथा ना हँसते हुए यानि शांत रहकर तथा भोजन में पूरा मन लगाकर भोजन करें।

(आजकल के समय में टी वी ना देखते हुए भोजन करने का नियम भी इसी श्रेणी में आएगा। भोजन के हित-अहित को तथा लाभ-हानि को जानकार भोजन करना चाहिए। )

अंतिम दो सिद्धांत पहली बार में साधारण लगते हैं किन्तु ये अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं। आधुनिक काल में हमने अपने जीवन को पूरी तरह अपनी आजीविका के अनुसार बाँधा हुआ है। उनमें मुख्य है – ऑफिस/कार्यालय में समय ना होने के कारण भोजन के समय से बहुत देर से भोजन करना तथा शीघ्रता से सेवन करना। इसी प्रकार कार्यालय में कुछ अन्य कार्य करते हुए तथा घर पर टी वी पिक्चर आदि देखते हुए भोजन करना अब एक आम बात हो गयी है।

ऐसा करने पर अत्यधिक हानि होती है – खाद्य नली से तथा पेट से आवश्यक तत्त्वों तथा अग्नि का पर्याप्त संपर्क नहीं होता तो पचाने के द्रव्यों से रहित भोजन आगे मार्ग पर नहीं बढ़ता, खाने के मार्ग से ऊपर की ओर आता है। उचित रूप से आमाशय आदि अपने स्थान में नहीं ठहरता है। भोजन में विद्यमान अखाद्य पदार्थ जैसे बाल, पत्थर के कण आदि निगल जाता है। आहार द्रव्य के उत्तम गुण व दोषों की प्राप्ति नहीं होती , खाने से तृप्ति नहीं होती, अधिक मात्रा में आहार का सेवन होता है, आहार ठंडा हो जाता है तथा पाक विषम यानि पचने में भारी तथा कठिन हो जाता है।

आहार क्रम

सुश्रुत ने आहार के क्रम का उत्तरतंत्रम् स्थान के स्वस्थवृत्ताध्याय में बताया है :

विसृष्टे विण्मूत्रे विशदकरणे देहे च सुलघौ विशुद्धे चोद्गारे हृदि सुविमले वाते च सरति

तथाऽन्नश्रद्धायां क्लमपरिगमे कुक्षौ च शिथिले प्रदेयस्त्वाहारो भवति भिषजां कालः स तु मतः।।

  1. मल तथा मूत्र त्याग करने के पश्चात
  2. इंद्रियाँ निर्मल होने के पश्चात
  3. शरीर हल्का होने का अनुभव होने पर
  4. डकार शुद्ध होने पर
  5. हृदय भाग हल्का लगने पर
  6. अपान वायु ठीक से निकलने पर
  7. भोजन की इच्छा होने पर
  8. शरीर व मन में किसी प्रकार का भारीपन न लगने पर
  9. उदर ढीला प्रतीत होने पर ही व्यक्ति को भोजन करना चाहिये। ऐसा ना कर के भोजन करना क्रमविरुद्ध कहलाता हैं।
  10. भोजन करते समय पहले मधुर रस वाला पदार्थ खाना चाहिए, बीच में अम्ल रस प्रधान तथा लवण रस प्रधान पदार्थ तथा अंत में कटु, तिक्त, कषाय रस प्रधान पदार्थ करना चाहिए। फल को भोजन के पहले तथा पेय (छाछ आदि) पश्चात में लेना है।

खाना खाते समय पेट के दो भाग अन्न से तथा एक भाग जल से भरने चाहिए तथा एक भाग वायु संचार के लिये खाली छोड़ देना चाहिए। यह भोजन की योग्य मात्रा है। 

उसी प्रकार योगरत्नाकर तथा चक्रपाणि की सुश्रुत व्याख्या ग्रंथ में भोजन के समय का निर्णय, अकालभोजन तथा अकालभोजन से होने वाली हानि का विस्तार से उल्लेख है। इसका एक मुख्य सूत्र है :

याममध्ये न भोक्तव्यं यामयुग्मं न लंघयेत्।।

इसके दो अर्थ हैं :

  1. पहले भोजन के तीन घण्टे (एक याम) बीतने के बाद ही अगला भोजन करें तथा छह घण्टे बीतने से पहले अगला भोजन कर ले।
  2. प्रातः कम से कम एक प्रहर (याम) बीतने से पहले तथा दो प्रहर (लगभग दोपहर 12 बजे) के पश्चात भोजन ना करें।

एक प्रहर में भोजन करने से रस की उत्पत्ति होती है तथा दो प्रहर के पश्चात भोजन करने से बल का क्षय होता है। इससे अलग समय किये गए भोजन को अकाल भोजन कहते हैं। उससे मुख्य रूप से जठराग्नि मंद हो जाती है तथा उसके मंद होने से यानि मंदाग्नि से अपच होता है, खाना पचता नहीं है तथा अजीर्ण व आम (यानि कच्चा रस) तो सभी रोगों के कारण है। जठराग्नि जब प्रज्वलित है तथा उसे आहार न मिले तो वह वातादि दोषों को पचाती है, दोषों के क्षय हो जाने पर रस-रक्तादि धातुओं को पचाती है तथा धातु के भी क्षय हो जाने के पश्चात प्राणों को पचाती है अर्थात भूख लगने पर भोजन ना करने से प्राण तक नष्ट हो जाता है।

इसी प्रकार अकाल भोजन जठराग्नि की विषमता तथा मंदाग्नि दोनों का कारण है जिसके फलस्वरूप अजीर्ण होता है तथा आम यानि कच्चा रस बनता है।

(इस संदर्भ में पुनः आधुनिक आहार प्रणाली की एक बात का मूल समझ लेना चाहिए। एक साथ पर्याप्त मात्रा में भोजन करने  के बजाय थोड़ी थोड़ी देर में कुछ कुछ खाते रहना तथा प्रातः काल उठते ही कुछ खा लेना या बेड-टी आदि लेना, तथा दो समय के भोजन के अलावा भी इधर-उधर किसी भी समय खाते रहना आजकल एक आम व्यवहार है। यह इस नियम के बिल्कुल विपरीत है तथा अकाल-भोजन की श्रेणी में ही आता है। अकाल भोजन का हानिकारक प्रभाव तुरंत नहीं दिखता, वह धीरे-धीरे शरीर की धातुओं में तथा दोषों में विषमता उत्पन्न करता है। इसे एक प्रकार का धीमा विष भी कहा जा सकता है। इस अपथ्य का आजकल अधिक प्रभाव दिखता है।)

सूचन: यदि आप यह लेख-श्रृखंला एक साथ पढ़ना चाहें तो यहाँ तो पढ़ सकते हैं.

Feature Image Credit: istockphoto.com


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