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तात राम नहिं नर भूपाला : भाग – १

रामो रामो राम इति प्रजानामभवन् कथाः।
रामभूतं जगदभूत् रामे राज्यं प्रशासति ।। वाल्मीकि रामायण ६-१२८-१०३।।

श्रीराम के राज्य पर शासन करने पर “राम, राम, राम” ऐसी ही प्रजा की कथाएँ होती थीं। सम्पूर्ण जगत् रामभूत (राममय) हो गया था।

कुछ ऐसा ही वातावरण आजकल समग्र भारत में दृष्टि गोचर हो रहा है। पौष शुक्ल द्वादशी आने को है और सारे राष्ट्र का ध्यान  उस पुण्य क्षेत्र पर ही केन्द्रित है जहां जगन्नाथ परमात्मा श्रीरामचन्द्र अपने अंशों सहित प्रकट हुए।  राम लला की गर्भगृह में प्रतिष्ठा होने वाली है।‌स्थान स्थान पर निमन्त्रण अक्षत पहुंच रहे हैं। भिन्न भिन्न क्षेत्रों के लोग भिन्न भिन्न प्रकार से राम गुण गान कर रहे हैं। प्रभु के आगमन की सूचना से जनमानस पुलकित हो उठा है।  ऐसा लग रहा है मानो प्रभु के वियोग से कृश हुई इस धरा को करोड़ों भक्त अपने आनन्द अश्रुओं से सींचकर पुनः नवजीवन प्रदान कर रहे हैं।

जन‌ जन पर श्रीराम का प्रभाव ही ऐसा है कि हर कोई इस उत्सव में ऐसे सम्मिलित हो रहा है मानो उसके अपने घर का ही उत्सव हो। हिमालय से समुद्र पर्यन्त भू भाग को एक सूत्र में बांधने वाले श्रीराम ही तो हैं जिन्होंने कोल भील वानर रीछ आदि को साथ लेकर अपनी कीर्ति का विस्तार किया। ऐसा कौन भारतीय है जो राम या रामकथा से परिचित न हो? असंख्य कवि कोविद रूपी पर्वतों से निकली रामचरित्र रूपी गंगा भारतीय जनमानस रूपी सागर की ओर  सदियों से अनवरत बह रही है।‌ इतिहास साक्षी है,सभ्यता का स्वर्णिम काल रहा हो या विधर्मी आक्रांताओं का कुसमय, रामकथा  ही हमारे समाज को सुदृढ़ आधार हुई। ऐसा क्या है जो जनता राम ही से इतना जुड़ी हुई है? क्या एक प्राचीन नरभूप के चरित्र में यह सामर्थ्य है कि वह जनजीवन पर ऐसी छाप छोड़े? यदि ऐसा होता तब तो ऐसे कई भूप होगये जिनका पराक्रम राम से भी बढ़ चढ़कर हो। परन्तु सभी कवि मुक्तकंठ से राम का ही गुणगान क्यों करते हैं? इस पर जयदेव ने प्रसन्नराघवम् में कहा है –“स्वसूक्तीनां पात्रं रघुतिलकमेकं कलयतां कवीनां को दोष: स तु गुणगणानामवगुण:”

“अपने सदगुुण कथन में  सब कवि बार बार  श्रीराम का ही वर्णन करते हैं तो इसमें कवियों का क्या दोष है, यह तो रामचन्द्रके  गुण समूहों का ही दोष है। “

प्रायः यह देखा जाता है कि  बार बार एक ही प्रकार के विषय का सेवन करने से उसमें रुचि घट जाती है। परन्तु रामकथा हेतु समाज में नित्य नूतन उत्कण्ठा देखने को मिली है।यदि ऐसा न होता रामचरित्र का इतना विशाल साहित्य कैसे उपलब्ध होता। कोरोना कालीन लाॅकडाऊन के समय में टेलीविजन पर पुनः प्रसारित रामायण कितनी सराही गई यह सबको विदित है। इसका कारण यह है कि अन्य विषय स्वत: प्रेमास्पद नहीं होते। परम प्रिय वस्तु तो अपना आत्मा ही है। आत्मा के लिए सब प्रिय होता है। किसी अन्य  से भी  प्रेम वास्तव में आत्मसुख हेतु ही होता है-

न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति
बृहदारण्यक उपनिषद २-४-५

और श्रीरामचन्द्र ही यह आत्मा हैं- रामः परात्मा प्रकृतेरनादिरानन्द एकः पुरुषोत्तमो हि – अध्यात्मरामायण १-१-१७

अनेक मनीषियों, टीकाकारों , इतिहासकारों साहित्य कारों ने अपनी अपनी दृष्टिसे  रामचरित्र को देखा। कुछ ने इसे एक वीर राजपुत्र का चरित्र बताया तो किसी ने कपोल कल्पना। किसीने राम के चरित्र पर ही आक्षेप किया और किसी ने उत्तम कविता का आनंद लिया।‌ हम यह समझने का प्रयास करते हैं कि रामचरित्र से रचनाकार कवियों को स्वयं का क्या अभीष्ट था। इस विषय में किसी मत का अवलंबन न लेकर स्वयं उनके वचनों को ही देखना चाहिए।

वाल्मीकि के राम

आरंभ करते हैं आदिकवि महर्षि वाल्मीकि से।

काव्य के आरंभ में ही महर्षि प्रतिज्ञा पूर्वक कहते हैं कि उन्होंने यह काव्य अपने शिष्यों को वेद के तात्पर्य का विस्तार करने हेतु ग्रहण करवाया-

वेदोपबृंहणार्थाय तौ अग्राहयत प्रभुः ।। वाल्मीकि रामायण- १-४-६।।

वेद विषयक  प्रमाण-प्रमेय विवेचन पहले के लेख में कर आए । जिज्ञासु गण इसका अवलोकन कर सकते हैं। 

यदि एक राजपुत्र का जीवन ही वेदार्थ होता तब वेद की प्रमाणिकता कहां है। तब वेद वही बता रहा है जो अन्य साधन से भी जाना जा सकता है। महर्षि वाल्मीकि किसी साधारण नर भूपाल का चरित्र नहीं कह रहे अपितु वेद वेद्य नारायण का गुणानुवाद कर रहे हैं। इसकी पुष्टि स्वयं महर्षि ही बालकाण्ड में करते हैं –

इत्येतद्वचनं श्रुत्वा सुराणां विष्णुरात्मवान् ।
पितरं रोचयामास तदा दशरथं नृपम्।। १-१६-८।।

समस्त आत्माओं को वश में रखने वाले विष्णु ने देवों की बात सुनकर अवतार काल में दशरथ को पिता बनाने की इच्छा की।

ततो यज्ञे समाप्ते तु ऋतूनां षट् समत्ययुः ।
ततश्च द्वादशे मासे चैत्रे नावमिके तिथौ ।। १-१८-८
नक्षत्रेऽदितिदैवत्ये स्वोच्चसंस्थेषु पंचसु ।
ग्रहेषु कर्कटे लग्ने वाक्पताविंदुना सह ।।१-१८-९
प्रोद्यमाने जगन्नाथं सर्वलोकनमस्कृतम् ।
कौसल्याजनयद्रामं सर्वलक्षणसंयुतम् ।। १-१८-१०।।

यज्ञ समाप्ति के बाद छ: ऋतु बीत गयीं, तब बारहवें मास में चैत्र शुक्ल नवमी को पुनर्वसु नक्षत्र एवं कर्क लग्न में कौसल्याने दिव्य लक्षणों से युक्त सर्वलोक नमस्कृत जगन्नाथ राम को जन्म दिया। तब पांच ग्रह अपने उच्च स्थान पर थे तथा लग्नमें चन्द्र और बृहस्पति विराजमान थे।

अब कुछ महानुभाव यह कहते हैं कि बालकाण्ड बाद में रामायण में जोड़ा गया। उस समय तक नर भूपाल को विष्णु समझना स्वाभाविक है।  यदि इस बात को मान भी लिया जाए तो भी रामचरित्र साधारण राजपुत्र का चरित्र नहीं सिद्ध होता। क्योंकि जिन काण्डों को प्रक्षिप्त नहीं माना जाता उनमें ही महर्षि कहते हैं –

सूर्यस्यापि भवेत्सूर्योह्यग्नेरग्निः प्रभोः प्रभोः ।
श्रियश्च श्रीर्भवेदग्र्या कीर्त्याः क्षमाक्षमा ।। २-४४-१५।।
दैवतम् दैवतानाम् च भूतानाम् भूतसत्तमः ।
तस्य केह्यगुणा देवि वने वा प्यथवा पुरे ।। २-४४-१६।।

राम सूर्य के भी सूर्य, अग्नि के भी अग्नि,ईश्वर के ईश्वर, लक्ष्मी के भी धन, कीर्ति की कीर्ति,क्षमा की क्षमा है। राम देवताओं के देवता,भूतों के भूत है। वह वन में हो या अयोध्या में उनमें क्या कमी है।

यह साधारण राजपुत्र के नहीं अपितु परात्पर ब्रह्म के वेद सम्मत लक्षण हैं।

वहीं सुन्दरकाण्ड में कहा गया

सर्वान् लोकान् सुसंहृत्य सभूतान सचराचरान् ।
पुनरेव तथा स्रष्टुं शक्तो रामो महायशाः।। ५.५१.३९।।

महान यश वाले भगवान राम सभी लोकों का और चराचर सहित सभी भूतों का संहार करके उन्हें पुनः पहले की तरह रच सकते हैं।

श्रीराम की शरणागतवत्सलता दिखाते हुए महर्षि लिखते हैं –

सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते ।
अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम ।। वाल्मिकी रामायण-६-१८-३३

जो एक बार भी शरणमें आकर ‘मैं तुम्हारा हूँ’ ऐसा कहकर मुझसे  रक्षाकी याचना करता है, उसे मैं सम्पूर्ण प्राणियोंसे अभय कर देता हूँ यह मेरा व्रत है।

यह बिल्कुल गीता के सर्वधर्मान् परित्यज्य… सा वर्णन है।

और अन्त में वाल्मीकि जी यह स्पष्ट कह देते हैं –

अक्षरं ब्रह्म सत्यं च मध्ये चान्ते च राघव ।।
लोकानां त्वं परो धर्मो विश्वक्सेनश्चतुर्भजः।।६-११७-१४

हे राम ! आप ब्रह्म हैं, अविनाशी हैं,  मध्य और अंत में रहने वाले सत्य हैं। आप ही लोकों में परम धर्म हैं । आप ही चतुर्भुज भगवान विष्णु हैं।  जैसा कि भागवत में कहा गया है – ‘कृष्णस्तु भगवान् स्वयं’, उसी प्रकार वाल्मीकि ने राम के लिए कहा- त्वं त्रयाणां हि लोकानामादिकर्ता स्वयंप्रभुः।६-११७-१९।। “आप ही तीनों लोकों के आदि कर्ता स्वयं भगवान् हैं।“ श्रीकृष्ण और श्रीराम का एकत्व भी महर्षि स्थापित करते हैं –

कृष्णश्चैव बृहद्बलः।। ६.११७.१७।।

हे राम! आप ही महाबली श्रीकृष्ण हैं।

उत्तरकाण्ड से तो राम की दिव्यता स्पष्ट ही है। पर क्योंकि लोग उसे प्रक्षिप्त कहते हैं इसलिए हम बिना उसके अवलंबन के ही वाल्मीकि के राम की वास्तविकता सिद्ध कर चुके।

व्यास के राम

महर्षि कृष्ण द्वैपायन  के विषय में प्रसिद्ध ही है-

अचतुर्वदनो ब्रह्मा द्विबाहुरपरो हरि:।
अभाललोचन:शम्भु: भगवान् बादरायण।। महाभारत- आदिपर्व।।

महर्षि व्यास बिना चार मुखों के ब्रह्मा हैं , दो भुजाओं वाले विष्णु और बिना तीसरे नेत्र के शंकर हैं।

इन्होंने ही लोगों की स्मृति और सामर्थ्य का लोप देखकर एक ही वेद के चार भाग कर दिये अतः यह वेद व्यास कहलाए।  वेदार्थ को जन जन तक पहुंचाने के लिए महाभारत जैसे महाकाव्य की रचना। वेद वेद्य ब्रह्म का विशद वर्णन ब्रह्म सूत्रों के द्वारा किया। पारंपरिक रूप से १८ महापुराणों के रचयिता भी महामुनि ही माने जाते हैं।

ऐसे प्रभाव वाले महामुनि ने तो महर्षि वाल्मीकि से भी अधिक राम गुण गान किया है। महाभारत में ही रामकथा कहने के अनेक अवसर महर्षि को प्राप्त हुए । वन पर्व में युद्धिष्ठिर-मार्कण्डेय संवाद रूप एक रामोपाख्यान पर्व है। इसके १६ अध्यायों में रामकथा विस्तार से कही गई। वहां जब देवता ब्रह्मा से रावण वध उपाय पूछते हैं तो ब्रह्मा  स्पष्ट रूप से कहते हैं –

तदर्थमवतीर्णोऽसौ मन्नियोगाच्चतुर्भुज:।।
विष्णु: प्रहरतां श्रेष्ठ: स तत् कर्म करिष्यसि।। महाभारत -वनपर्व- २७६-५।।

रावण के निग्रह के लिए मैं चतुर्भुज भगवान विष्णु से अनुरोध कर चुका हूं। मेरी प्रार्थना से वे भूतलपर अवतार ले चुके हैं । योद्धाओं में श्रेष्ठ वे ही यह कार्य करेंगे।

इस वनपर्व के ही तीर्थयात्रा पर्व के अन्तर्गत अध्याय ९९ में  श्रीराम द्वारा परशुराम के वैष्णव तेजके हरण और परशुराम का भृगुतीर्थ में स्नान करके पुनः तेजोप्राप्ति की विस्तृत कथा है। उस संदर्भ में लोमश ऋषि कहते हैं-

जातो दशरथस्यासीत् पुत्रो रामो महात्मन:।।४०
विष्णु: स्वेन शरीरेण रावणस्य वधाय वै।
पश्यामस्तमयोध्यायां जातं दाशरथिं तत:।।४१।।

पूर्वकालमें महात्मा दशरथ के यहां साक्षात् विष्णु अपने ही विग्रह से रामरूप में रावण वध हेतु अवतरित हुए । अयोध्या में प्रकट हुए राम का हम लोग प्रायः दर्शन करते रहते थे‌ ।

वहीं भीम हनुमान संवाद में हनुमान जी के मख से भी महर्षि संक्षिप्त रामचरित्र कहलवाते हैं। वहां भी कहा गया-

अथ दाशरथिर्वीरो रामो नाम महाबल:।
विष्णुर्मानुषरूपेण चचार वसुधातलम्।। महाभारत -वनपर्व-१४७-३१

उस समय (त्रेतायुग में)महाबली वीर दशरथ पुत्र राम जो साक्षात् विष्णु ही थे जो मनुष्य रूप धारण करके पृथ्वी पर विचर रहे थे।

केवल इतने से ही महर्षि की तृप्ति नहीं हुई। महाभारत शान्तिपर्व के मोक्षपर्व के अंतर्गत भी भगवान स्वयं अपने मुख्य अवतारों का वर्णन करते हुए रामावतार के विषय में कहते हैं –

संध्यांशे समनुप्राप्ते त्रेताया द्वापरस्य च।
अहं दाशरथी रामो भविष्यामि जगत्पति:।। शान्तिपर्व -३३९-८५।।

त्रेता और द्वापर की सन्धि में मैं ही दशरथ पुत्र जगदीश्वर राम के रूप में प्रकट होऊंगा।

महाभारत के खिल अर्थात् हरिवंश पर्व में भी वेद व्यास भगवान राम जगत्पति नारायण ही कहते हैं-

कृत्वाऽऽत्मानं महाबाहुश्चतुर्धा प्रभुरीश्वर:।
लोके राम इति ख्यातस्तेजसा भास्करोपम:।। हरिवंश -१-४१-१२२।।

उस समय सर्वसमर्थ महाबाहु भगवान अपने को ४ रूपों में प्रकट करके स्वयं राम नाम से विख्यात हुए। राम सूर्य के समान तेजस्वी थे।

पुराणों के राम

आईए अब पुराण साहित्य में श्रीराम का दर्शन करें।  विभिन्न देवताओं की प्रधानता से विभिन्न प्रकार के पुराण हैं। वैष्णव पुराणों में तो  निर्विवाद रूप से श्रीराम का नारायण के रूप में  बखान हुआ है। अतः अधिक विस्तार के भय से उसकी चर्चा हम नहीं करते। परन्तु शैव और शाक्त पुराणों में भी श्रीराम को साधारण नरभूप नहीं अपितु साक्षात् विष्णु ही स्वीकार किया गया है। यहां तक कि उनकी दिव्यता को सब प्रकार से पुराण के प्रधान देवता जैसा ही दिखाया गया है।

जैसे शिवपुराण की रुद्रसंहिता के सतीखण्ड में भगवान शंकर दण्डक वन में विचरते हुए विरह से पीड़ित राम को ईश्वर समझकर नमस्कार करते हैं –

जयेत्युक्तवान्यतोऽगच्छन्नदात्तस्मै स्वदर्शनम्।
रामाय विपिने तस्मिन् शंकरो भक्तवत्सल:।। शिवपुराण-रुद्रसंहिता-सतीखण्ड-२४-२८।।

उस समय शंकर ने  वनमें घूमते हुए राम को प्रसन्नता के साथ प्रणाम किया और जय जयकार करके वे दूसरी ओर चले गये। उन भक्तवत्सल शंकर ने वन में पुनः राम को दर्शन नहीं दिया‌।

इसके बाद शिव स्वयं राम को नारायण बताते हुए कहते हैं-

ज्येष्ठोरामाभिधो विष्णु: पूर्णांशो निरुपद्रव:।।२४- ३९।।

इन दोनों भाइयों में ज्येष्ठ का नाम राम है जो विष्णु के पूर्णावतार हैं तथा उपद्रव रहित हैं।

शाक्त पुराणों में भी श्रीराम को भूभार हरण हेतु अवतरित नारायण ही बताया गया। देवि भागवत के तृतीय स्कंध के अध्याय २८ -३० में रामचरित्र का विस्तृत वर्णन हुआ है ।

वहां भी नारदजी राम से कहते हैं –

तव जन्म च काकुत्स्थ तस्य नाशाय चामरै:।
प्रार्थितस्य हरेरंशादजवंशेऽप्यजन्मन:।। ३-३०-१४।।

हे राम ! आपका जन्म उस रावण के नाश के लिए देवताओं के प्रार्थना करने पर अजन्मा भगवान् विष्णु के अंश से अज के वंश में हुआ है।

देवि भागवत के ही स्कंध ८ के अध्याय १० में किम्पुरुष वर्ष में नित्य विराजमान श्रीराम का हनुमान जी के द्वारा किस प्रकार अर्चन होता है, इसका विस्तृत वर्णन है।

इस ही प्रकार शाक्तों के महाभागवत नामक  उपपुराण में अध्याय ३६-४८ तक रामोपाख्यान आया है जहां राम कथा का विस्तृत वर्णन हैं। वहां भी श्रीराम को विष्णु का अंश बताया गया है।

ब्रह्मांडपुराण के अन्तर्गत उमा-महेश्वर संवाद के रूप में अध्यात्मरामायण रूपी रामचरित्र प्राप्त होता है। इसका महत्व इस बात से ही सिद्ध होता है कि गोस्वामी तुलसीदास जी ने मानस का अधिकांश भाग अध्यात्मरामायण से ही लिया है। यहां तक की कुछ उपदेशों को तो ज्यों का त्यों संस्कृत भाषा से अवधि में गोस्वामीजी द्वारा उतार लिया गया है। अध्यात्मरामायण में राम के अद्वितीय चिन्मय ब्रह्म स्वरूप का ही विस्तृत वर्णन है ।

पौराणिक साहित्य में रामचरित्र का समग्र वर्णन करने के लिए कई लेख कम पड़ जाएं। अतः पौराणिक राम प्रसंग को यहीं विराम देते हैं।

कालिदास के राम

भारतीय साहित्य की चर्चा हो और महाकवि कालिदास का उल्लेख न हो तो ऐसी चर्चा अधूरी ही है। कालिदास के काव्य कौशल और भारतीय काव्य परंपरा पर उनके प्रभाव को किसी परिचय की आवश्यकता नहीं। यहां हम पाठकों केवल  महाकवि ने  राम की झलक दिखलाना चाहते। कालिदास ने भी  रामचरित्र गया जो कि’ रघुवंश महाकाव्य ‘ का भाग है। इसमें सर्ग १०- १५ तक श्रीराम का चरित्र विस्तार से वर्णित है। परन्तु देखने योग्य बात ये हि कालिदास ने भी एक भक्त की भांति परात्पर ब्रह्म श्रीराम को भजन ही किया है।

रावण के अत्याचार से पीड़ित देवगण परम पुरुष परामात्मा की शरण ग्रहण करके स्तुति करते हैं –

नमो विश्वसृजे पूर्वं विश्वं तदनु बिभ्रते ।
अथ विश्वस्य संहर्त्रे तुभ्यं त्रेधास्थितात्मने।।
अमेयो मितलोकस्त्वं अनर्थी प्रार्थनावहः ।
अजितो जिष्णुरत्यन्तं अव्यक्तो व्यक्तकारणम्।।
हृदयस्थं अनासन्नं अकामं त्वां तपस्विनं ।
दयालुं अनघस्पृष्टं पुराणं अजरं विदुः ।।
सर्वज्ञस्त्वं अविज्ञातः सर्वयोनिस्त्वं आत्मभूः ।
सर्वप्रभुरनीशस्त्वं एकस्त्वं सर्वरूपभाक्।।
अजस्य गृह्णतो जन्म निरीहस्य हतद्विषः ।
स्वपतो जागरूकस्य याथात्म्यं वेद कस्तव।।
(रघुवंश १०-१६,१८-२०,२४)

“विश्व के सर्जक,पालक,संहारक -त्रिधा स्वरूप में स्थित आपको नमस्कार। आप अपरिमेय होकर भी लोक परिमेय हैं, नि:स्पृह होकर भी कामप्रद हैं,जयशील हैं और अत्यंत सूक्ष्म होकर भी स्थूल रूप के कारण हैं। आप सर्वांतर्यामी,निष्काम और प्रशस्त तप से दीप्त, दयालु और नित्यानंदस्वरूप, अनादि और अक्षर हैं। आप सर्वज्ञ हैं,पर आपको कोई नहीं जान पाता। आप सर्वयोनि होकर भी स्वयंभू हैं। प्रभु होकर भी स्वयं अनीश हैं और एक होकर भी सर्वात्मा हैं। आप अजन्मा होकर भी जन्म लेते हैं, अकर्ता होकर भी शत्रु विनाश आदि लोक कल्याणकारी कर्म करते हैं और योगनिद्रा में रहते हुए भी सब कुछ देखते हैं। आपके वास्तविक स्वरूप को कौन जान सकता है।“

यही परब्रह्म परमात्मा श्रीरामचन्द्र के रूप में अवतरित होते दिखाए गये हैं –

सोऽहं दाशरथिर्भूत्वा रणभूमेर्बलिक्षमम्।
करिष्यामि शरैस्तीक्ष्णैस्तच्छिर: कमलोच्चयम्।।१०.४४।।

मैं ही दशरथ पुत्र राम के रूप अवतार लेकर राक्षसराज रावण का वध करुंगा।

उपनिषदों में राम

जिन रामचंद्र की ब्रह्मरूपता का उपदेश, काव्य कान्ता के समान,  इतिहास पुराण मित्र के समान करते हैं, उन्हीं राम के ज्ञान और उनकी उपासना का उपदेश, उपनिषदें गुरु के समान करती हैं। शुक्लयजुर्वेदीय मुक्तिकोपनिषद् के प्रथम अध्याय में १०८ प्रामाणिक उपनिषदों के सूची प्राप्त होती है। इनमें रामतापनीय, रामरहस्य, तारसार और स्वयं मुक्तिकोपनिषद् श्रीराम विषयक उपनिषदें हैं। कुछ लोग कहते कि केवल वे उपनिषद प्राचीन हैं जिन पर शंकराचार्य ने भाष्य लिखे हैं। परन्तु वे ये भूल जाते हैं कि उन भाष्यों में भी शंकराचार्य मुक्तिकोपनिषद् में बताये १०८ उपनिषदों की श्रुतियों का प्रमाण रूप से उल्लेख करते हैं। अथर्ववेदीय रामतापनीय उपनिषद पूर्व और उत्तर भाग में विभाजित है।  पूर्वभाग के १० खण्डों में राम की ब्रह्मरूपता और उनकी  उपासना का विस्तृत वर्णन है। उत्तर भाग में राम के तारक ब्रह्म स्वरूप और राम मन्त्र का विस्तृत वर्णन है। तारसार उपनिषद में भी राम के नारायण मन्त्र का ही विस्तार से वर्णन किया गया है। रामरहस्य उपनिषद् में हनुमान जी सनकादिक, प्रह्लादादि भक्तों को श्रीराम के विजय मन्त्र का उपदेश करते हैं और उनके विभिन्न ध्यान स्वरूपों का वर्णन करते हैं। मुक्तिकोपनिषद् श्रीराम और हनुमान का संवाद हैं जहां श्रीराम हनुमानजी को वेद प्रामाण्य ,विभिन्न प्रकार की मुक्ति की अवस्थाओं और अपनी ब्रह्मरूपता का उपदेश करते हैं।

उपसंहार

उपर्युक्त विवेचन से एक बात तो स्पष्ट रूप से सिद्ध हो जाती है कि  भारतीयों की दृष्टि में राम मात्र लोक नायक या राजपुरुष नहीं अपितु राम उनके जीवन का परम ध्येय है। उनका अपना आत्मा है। यह संबंध संसार के अन्य नश्वर नातों के जैसा नहीं। यह तो बंधन है जिसमें बंधकर मनुष्य सिद्ध हो जाता है, तृप्त हो जाता है अमर हो जाता है। यह भक्त और भगवान का संबंध है ‌

यल्लब्ध्वा पुमान् सिद्धो भवति अमृतो भवति तृप्तो भवति

जिसको ( परम प्रेम रूपा  और अमृत स्वरूपा भक्ति को)  पाकर मनुष्य सिद्ध हो जाता है, अमर हो जाता है, तृप्त हो जाता है।

(नारद भक्ति सूत्र )

अब यदि कोई आपसे कहे कि मध्यकालीन कवियों ने राम को ईश्वर बनाया तो वह मात्र अपनी अज्ञता का ही प्रदर्शन कर रहा है। राम का ईश्वरत्व वैष्णव सम्प्रदायों और मध्यकालीन कवियों से पहले भी जनमानस में विदित था। यही कारण है कि विदेशी आक्रांताओं जैसी विषम परिस्थितियों में भी रामचरित्र जनजागृति का माध्यम बना।

अब बात को अधिक न बढ़ाकर हनुमन्नाटक के इस श्लोक से मैं अपनी लेखनी को विराम देता हूं

यं शैवाः समुपासते शिव इति ब्रह्मेति वेदान्तिनो
बौद्धा बुद्ध इति प्रमाणपटवः कर्तेति नैयायिकाः।
अर्हन्नित्यथ जैनशासनरताः कर्मेति मीमांसकाः
सोऽयं वो विदधातु वाञ्छितफलं त्रैलोक्यनाथो हरिः।।

जिन शिव की शैव उपासना करते हैं,जो  वेदान्तियों के ब्रह्म हैं, जो बौद्धों के बुद्ध और प्रमाणपटु नैयायिकों के परम कर्ता ईश्वर हैं, जो जैन मतावलंबियों के अर्हन हैं, मीमांसकों के कर्म हैं, वह त्रिलोकपति श्रीराम आपकी मनोकामना पूरी करें।

(हनुमन्नाटक मंगलाचरण)

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