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देवों के देव महादेव


“पशूनां पतिं पापनाशं परेशं गजेन्द्रस्य कृत्तिं वसानं वरेण्यम।

जटाजूटमध्ये स्फुरद्गाङ्गवारिं महादेवमेकं स्मरामि स्मरारिम।।”

महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर महादेव शिव का स्मरण करते हुए समस्त सृष्टि के कल्याण की कामना की जाती है।

देवों के देव महादेव भोलेभंडारी हैं और इनके स्मरण मात्र से ही प्रत्येक प्राणी के समस्त कष्टों का अन्त संभव है।

पुराणों में भगवान शिव के कुल ग्यारह रुद्र अवतार बताए गए हैं। इनकी उत्पत्ति की कथा भी अत्यंत रोचक है।

देव- दानव युद्ध चरम पर था। दानवों ने सभी प्रकार के अस्त्र-शस्त्र का प्रयोग कर अपनी विजय सुनिश्चित की और इस विजय के मद में ही देवों को स्वर्ग से निष्कासित कर दिया। सभी देवता हतोत्साहित एवं पराजित हो शोक संतप्त हृदय से कश्यप मुनि की शरण में आश्रय लेते हैं।

वे अपने जनक मुनि कश्यप को अपने शोक का संपूर्ण कारण कहते हैं। कश्यप मुनि महादेव शिव के परम भक्त थे। अपनी संतति को व्यथित देख ,उन्होंने उनको आश्वासन दिया और काशी जाकर माँ गंगा के तीर भगवान शिव की पूजा-अर्चना प्रारंभ की। उनकी अखंड भक्ति देख भगवान भोलेनाथ प्रसन्न हुए और दर्शन का सौभाग्य प्रदान करते हुए वर मांँगने को कहा।

कश्यप मुनि कृतार्थ हुए और तत्क्षण देवों के कल्याणार्थ उनके यहाँ पुत्र रूप में जन्म लेने का वर मांँग लिया। भगवान ने भक्त की मनोकामना कब अस्वीकार की? चंद्रशेखर शिव ने मुनि कश्यप को वर दिया। उचित समय पर उनकी भार्या के गर्भ से ग्यारह रुपों में अवतरित हुए और यही ग्यारह रुद्र कहलाए।

रुद्ररूप देवाधिदेव महादेव देवों के कष्ट दूर करने हेतु ही प्रकट हुए थे एवं देवताओं को पुन: स्वर्ग में आरूढ़ करवाकर उनकी प्रतिष्ठा पुनः स्थापित की । धर्मशास्त्रों के अनुसार यह ग्यारह रुद्र देवताओं की रक्षा के लिए सदैव स्वर्ग में ही वास करते हैं।

भगवान शिव के इस प्रखर रूद्र रूप की परिभाषा हमारे शास्त्रों में अनेक प्रकार से दी गई है, जिन्हें जानना और समझना स्वयं में एक अभूतपूर्व अनुभव ही है। ‘लिंगपुराण’ के अनुसार सृष्टि के चक्र को तीव्रता प्रदान करने के लिए भगवान शिव ने ही स्वयं ग्यारह अमर व शक्तिशाली रूद्र रूप की संरचना की थी। कहीं यह रौद्र रूप में दिखते हैं तो कहीं सौम्य रूप में दर्शन देते हैं। यह दोनों ही एक-दूसरे के पूरक हैं।

‘रू’ का अर्थ है ‘चिंता’ और ‘द्र’ अर्थात दूर करना, इस कारण रूद्र का अर्थ हुआ जो हमारे समस्त दुखों, समस्याओं एवं चिंताओं का नाश कर दे।

हमारे प्राचीन शास्त्रों में भगवान रूद्र का अभूतपूर्व वर्णन मिलता है। ऐसा वर्णित किया गया है कि उनके पांँच सिर और धड़ एकदम पारदर्शी और चमकीला है।

शिखर में चंद्रमा विराजते हैं और वहीं से गंगा की निर्मल धारा निरंतर प्रवाहित होती दिखती है।वे गले में सर्प धारण करते हैं तथा उनके वामांग में माता पार्वती का वास है। त्रिनेत्रधारी भगवान रूद्र के चार हाथों में से एक में त्रिशूल स्थित है।

मान्यता है कि श्री रामभक्त हनुमान उनके ग्यारहवें रूद्रावतार ही हैं, जो वानर रूप में भगवान विष्णु के अवतार श्रीराम के सहायतार्थ ही धरा पर अवतरित हुए एवं सदैव उनकी सेवा में तत्पर रहते हुए उनकी सहायता की। वे इहलोक एवं परलोक दोनों में ही पूज्य हैं और इसी रूप में अपने भक्तों के संपूर्ण कष्ट हरते हैं।

भगवान शिव के रूद्र रूप को पालनहार और संहारक दोनों की ही संज्ञा प्राप्त है,जहाँ उनका रौद्र रूप प्रलय का द्योतक है, वहीं उनका सौम्य रूप अत्यंत शांत और करूणामयी है।

ऋग्वेद और यजुर्वेद में भगवान रूद्र को पृथ्वी और स्वर्ग के बीच स्थित कैलाश पर्वत के इष्ट देव के रूप में पूजित किया गया है। वहीं उपनिषदों में भगवान रूद्र के दस रूपों को शरीर के दस महत्वपूर्ण ऊर्जा स्रोत मानने के साथ ही 11 वें रूप को आत्मस्वरूप माना गया है। सृष्टि में जो भी जीवित है, स्पंदित है, चेतन है वह इन्हीं की कृपा से है।

मृत्यु के देव भी रूद्र ही हैं। स्वजनों की मृत्यु के पश्चात् पश्चात उनके वियोग में रुदन भी स्मरण का भाव है, इसीलिए रूद्र को पवित्र अर्थों में रुलानेवाला भी कहा जाता है।

आइए रूद्रावतार महादेव शिव के नाम पर भी क्षणिक चर्चा करते हैं।

प्रथम रूप महाकाल शिव के दस प्रमुख अवतारों में पहला अवतार महाकाल को माना गया है। इस अवतार की शक्ति मांँ महाकाली मानी जाती हैं। उज्जैन में महाकाल नाम से ज्योतिर्लिंग विख्यात है। उज्जैन में ही गढ़कालिका क्षेत्र में मां कालिका का प्राचीन मंदिर भी है। शिव-शक्ति एक दूसरे के पूरक हैं।

द्वितीय रूप तारा शिव के रुद्रावतार में दूसरा अवतार तार (तारा) नाम से प्रसिद्ध है। इस अवतार की शक्ति तारादेवी मानी गईं हैं। जिनका पीठ पश्चिम बंगाल के वीरभूम में स्थित द्वारका नदी के पास महाश्मशान में स्थित है।

तृतीय रूप बाल भुवनेश देवों के देव महादेव का तीसरा रुद्रावतार है बाल भुवनेश। इस अवतार की शक्ति को बाला भुवनेशी माना गया है। दस महाविद्या में से एक माता भुवनेश्वरी का शक्तिपीठ उत्तराखंड में है। जहाँ पावन सरिता का संगम गंगाजी से व्यासचट्टी में होता है, इसी स्थान पर भगवान वेदव्यासजी ने श्रुति एवं स्मृतियों को वेद पुराणों के रूप में लिपिबद्ध किया था।

चतुर्थ अवतार षोडश श्रीविद्येश भगवान शंकर का चौथा अवतार षोडश श्रीविद्येश हैं। इस अवतार की शक्ति को देवी षोडशी श्रीविद्या माना जाता है। ‘दस महा-विद्याओं’ में तीसरी महा-विद्या भगवती षोडशी है, अतः इन्हें तृतीया भी कहते हैं। भारतीय राज्य त्रिपुरा के उदरपुर के निकट राधाकिशोरपुर गांव के माताबाढ़ी पर्वत शिखर पर माता का दायाँ पैर गिरा था। इसकी शक्ति है त्रिपुर सुंदरी और भैरव को त्रिपुरेश कहते हैं।

पंचम रूप भैरव शिव के पांँचवें रुद्रावतार सबसे प्रसिद्ध माने गए हैं जिन्हें भैरव कहा जाता है। इस अवतार की शक्ति भैरवी गिरिजा मानी जाती हैं। उज्जैन के शिप्रा नदी तट स्थित भैरव पर्वत पर मांँ भैरवी का शक्तिपीठ माना गया है, किंतु कुछ विद्वान गुजरात के गिरनार पर्वत के सन्निकट भैरव पर्वत को वास्तविक शक्तिपीठ मानते हैं अत: दोनों स्थानों पर शक्तिपीठ की मान्यता है।

षष्टम् रूप छिन्नमस्तक छठा रुद्र अवतार छिन्नमस्तक नाम से प्रसिद्ध है। इस अवतार की शक्ति देवी छिन्नमस्ता मानी जाती हैं। छिनमस्तिका मंदिर प्रख्यात तांत्रिक पीठ है। मांँ छिन्नमस्तिका का विख्यात सिद्धपीठ झारखंड की राजधानी रांची से 75 किमी दूर रामगढ़ में है। मांँ का प्राचीन मंदिर नष्ट हो गया था अत: नया मंदिर बनाया गया, किंतु प्राचीन प्रतिमा यहां मौजूद है। दामोदर-भैरवी नदी के संगम पर स्थित इस पीठ को शक्तिपीठ माना जाता है। ज्ञातव्य है कि दामोदर को शिव व भैरवी को शक्ति माना जाता है।

सप्तम् रूप द्यूमवान शिव के दस प्रमुख रुद्र अवतारों में सातवांँ अवतार द्यूमवान माने गए हैैं। इस अवतार की शक्ति को देवी धूमावती माना जाता हैं। धूमावती मंदिर मध्यप्रदेश के दतिया जिले में स्थित प्रसिद्ध शक्तिपीठ ‘पीताम्बरा पीठ’ के प्रांगण में स्थित है। पूरे भारत में यह मांँ धूमावती का एक मात्र मंदिर है जिसकी मान्यता भी अधिक है।

अष्टम् रूप बगलामुख शिव का आठवांँ रुद्र अवतार ‘बगलामुख’ नाम से जाना जाता है। इस अवतार की शक्ति को देवी बगलामुखी माना जाता है। दस महाविद्याओं में से एक बगलामुखी के तीन प्रसिद्ध शक्तिपीठ हैं- 1. हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा में स्थित बगलामुखी मंदिर, 2. मध्यप्रदेश के दतिया जिले में स्थित बगलामुखी मंदिर और 3. मध्यप्रदेश के शाजापुर में स्थित बगलामुखी मंदिर। इसमें हिमाचल के कांगड़ा को अधिक मान्यता प्राप्त है।

नवम् रूप मातंग शिव के दस रुद्रावतारों में नौवां अवतार मातंग है। इस अवतार की शक्ति को देवी मातंगी माना जाता है। मातंगी देवी अर्थात राजमाता दस महाविद्याओं की एक देवी है। मोहकपुर की मुख्य अधिष्ठात्री हैं। देवी का स्थान झाबुआ के मोढेरा में है।

दशम् रूप कमल शिव के दस प्रमुख अवतारों में दसवां अवतार कमल नाम से विख्यात है। इस अवतार की शक्ति को देवी कमला माना जाता है।

इन प्रमुख रूद्रावतारों के अतिरिक्त भगवान् शिव के अन्य अवतार भी हैं। इन्हें निम्न नामों से स्मरण किया जाता है- कपाली, पिंगल, भीम, विरुपाक्ष, विलोहित, शास्ता, अजपाद, आपिर्बुध्य, शम्भू, चण्ड तथा भव।

महादेव के अंशावतार भी सृष्टि में किसी ना किसी रूप में व्याप्त हैं।भोलेनाथ शिव के दुर्वासा, हनुमान, महेश, वृषभ, पिप्पलाद, वैश्यानाथ, द्विजेश्वर, हंसरूप, अवधूतेश्वर, भिक्षुवर्य, सुरेश्वर, ब्रह्मचारी, सुनटनतर्क, द्विज, अश्वत्थामा, किरात और नतेश्वर आदि अवतारों का उल्लेख भी ‘शिव पुराण’ में हुआ है। शिव के बारह ज्योतिर्लिंग भी अवतारों की ही श्रेणी में आते हैं।

शिव ही विश्व का एकमात्र कर्ता हैं। वह कर्ता स्वयं में इतना परिपूर्ण है कि उसे किसी अन्य कारण की अपेक्षा ही नहीं।यह विश्व शिव का रूप होने के कारण उन्हीं के समान वास्तविक है। शिव जब सृष्टि रचना करना चाहते हैं तो विश्व के समस्त पदार्थ उन्हीं में आभासित होने लगते हैं और जब सृष्टि को समेटना चाहते हैं तो सभी पदार्थ शिव में ही समाहित हो जाते हैं इसीलिए शिव पृथक हैं और विश्व पृथक है ,यह असंभव है।

महाशिवरात्रि पर देवाधिदेव महादेव की स्तुति समस्त प्रकृति को सुवासित करे, इसी मंगल कामना के साथ हर हर महादेव!

Feature Image Credit: youtube.com


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