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आदिवासी दिवस की हुंकार

मैं हिमाद्री………..

 आयु मत पूछिए, बस ये जान जाइए कि मैंने युगों को बदलते देखा है। अपनी गोद में समेटे अखंड भारतवर्ष के हर सुख दुख का साक्षी रहा हूंँ। मैंने इसे उत्सव मनाते देखा तो शोक के ज्वार में डूबते भी देखा लेकिन कभी पराजित होते नहीं देखा। मैंने इसकी सिसकियांँ भी सुनी तो युद्ध नाद के संग हर्ष लहरी भी सुनी अश्रु के धार पोंछे तो खिलखिलाहट भी बाँटी। किस्सा प्रारंभ करूंँ तो पृथ्वी के कई घूर्णन पूर्ण हो जाएँ।

 चलिए सुनाता हूंँ आपको भारतवर्ष के एक अत्यंत प्रिय पुत्र की असाधारण सी कथा।

पृष्ठभूमि

अखंड भारत वर्ष, इस स्वर्णमय, स्वर्गमय, परम शांत राष्ट्र में  बाह्य आघात यूनानी आक्रांता सिकंदर के आक्रमण से हुआ, जिसने विक्रम संवत 277 पूर्व इस धरा की ओर कदम बढ़ाए। सिकंदर के मार्ग में जो भी राजा और राज्य आए वह सिकंदर से पद दलित होते गए परंतु उस आक्रांता का भारत में प्रवेश झेलम नदी के तट पर ही अटक गया और वहांँ के राजा पोरस भारतीय गौरव के पर्याय बन गए।

सिकंदर के आक्रमण के बाद लगभग 1000 वर्षों तक भारत राष्ट्र की सीमाओं पर शांति रही लेकिन आठवीं सदी के आरंभ में शांति को एकबार फिर ग्रहण लग गया और हमारी सीमाएंँ पुन: असुरक्षित होने लगीं।

इस बार ख़लीफा उमर ने भारत पर चढ़ाई की लेकिन वह विफल रहा। वर्ष 705 में कासिम के बेटे महमूद ने भारत पर आक्रमण किया और सिंध प्रांत को विजय करता हुआ वह मेवाड़ राज्य की ओर बढ़ आया जिसकी स्थापना देवर्षि हारीत के आशीर्वाद से भगवान एकलिंग के स्थायी स्वामित्व के साथ की गई थी और संचालन मात्र के लिए रघुवंशी राजाओं ने भगवान एकलिंग के दीवान के रूप में पीढ़ी दर पीढ़ी इस पावन राज्य की सेवा स्वीकार की। महमूद को बप्पा रावल ने पराभूत किया।

बाद के समय में महमूद गजनवी, मोहम्मद गोरी,अलाउद्दीन खिलजी और बाबर जैसे आक्रांताओं ने भारत का समस्त वैभव हड़पने का पूर्ण प्रयास किया लेकिन शाश्वत मूल्यों की रक्षा में हमारे पूर्वजों ने भी अदम्य साहस का परिचय दिया और निरंतर आघातों के बावजूद भारत में भारतीयता बनी रही।

 भारतीयता पर सर्वाधिक घातक प्रहार पाश्चात्य आगमन से शुरू हुआ पुर्तगाली नागरिक वास्को-डी-गामा दक्षिण अफ्रीका की परिक्रमा करते हुए देवधारा के कालीकट बंदरगाह पर पहुंचा। वास्को-डी-गामा का आगमन जहाँ यूरोप के लिए धन-संपत्ति का द्वार बना, वहीं भारतीयों के शांत जीवन में झंझावत का आरंभ था। सभ्यता और संस्कृति का संघर्ष था।

२३ जून १७५७ में हुए प्लासी के युद्ध ने ब्रिटिश सत्ता की आधारशिला स्थापित की और तभी से प्रारंभ हुआ गोरे अंग्रेजों का काला अध्याय।

वर्ष प्रति वर्ष बरतानिया बर्बरता बढ़ती गई।कभी नवीन कानून की आड़ में तो कभी सर्वोच्चता स्थापित करने हेतु वो अन्याय और दमन की पराकाष्ठा पार करते रहे।

१० मई सन् १८५७ का वो महासमर जिसमें मंगल पांडे,रानी झांसी, वीर कुँवर सिंह, तांत्याटोपे जैसे देशभक्तों ने स्वयं को आहुत कर दिया वहीं कुछ रजवाड़े गोरों के मित्र और शुभचिंतक बन भारत माँ को कलंकित करते रहे।

मैं मौन साक्षी बना रहा।देखता रहा ये दृश्य और मेरी संतति का संघर्ष जो चहुँओर समान था।

इन्हीं के बीच राजपूताने की वीर प्रसूता भूमि ने एक रणबाँकुरे को जन्म दिया जो काल से लड़ता आगे बढ़ा।

जन्म:-

प्रजा के लिए उत्पीड़न, अंग्रेजों के लिए उल्लास और भारतीय नरेशों के लिए भ्रम का यह अवसर ‘संक्रमण काल’ था। ऐसे ही काल में मेवाड़ राज्य की डूँगरपुर रियासत में स्थित सीमलवाड़ा के पास बाँसिया बेड़सा गाँव में वीर माता लाटकी बाई और बणजारा समाज में प्रतिष्ठित बेछड़गेर सा रहते थे। लाटकी बाई एक अत्यंत ही धार्मिक महिला थीं।

ईश्वर कृपा से उनके छोटे से गांँव बाँसिया में एक गोरख पंथी कनफड़े संन्यासी का आगमन हुआ। लाटकी बंजारन ने बड़े ही शांत भाव से सुंदर वाणी में उनके उपदेशों को सुना और उन से अत्यंत प्रभावित हुई। वहीं उसे गुरु गोरखनाथ की गौ रक्षा संबंधी कार्यों इत्यादि के विषय में भी जानकारी मिली। लाटकी बंजारन की निष्कपट साधना से उसे स्वप्न में गुरु गोरखनाथ के दर्शन हुए और उन्हीं के आशीर्वाद स्वरुप 20 दिसंबर 1858 के दिन उनके गर्भ से श्रेष्ठ संतान का जन्म हुआ। गुरु गोरखनाथ की दी हुई गूगल से जन्म मानकर उस यशस्वी बालक का नाम ‘गूगो’ रखा गया। आस पड़ोस के लोगों ने गाय के प्रति बालक की अपार श्रद्धा को देख उसका नाम ‘गोमा’ रख दिया और वहीं गायों का रखवाला होने से इस बालक का नाम ‘गोविंद’ रखा गया।

घुमंतू जीवन:-

शुक्ल पक्ष के चंद्रमा के समान बढ़ते गूगा का मन शिक्षालयों में कम,देवालयों एवं भजन मंडली में अधिक रहता। उसने १२ वर्ष की आयु तक पैतृक कार्य संभाल लिया। मेवाड़ राज्य की कृषि उपज को बैलों पर लाद अन्य इलाकों में ले जाना और वहाँ की उपज मेवाड़ तक लाना,यही उनका काम था। लाखा बणजारे के साथ की इन अनगिनत यात्राओं ने तात्कालिक सामाजिक परिवेश के प्रति सूक्ष्म अन्त:दृष्टि जगा दी। उन्होंने मेवाड़ रियासत ही नहीं वरन् रियासत की सीमाओं से बाहर सिरोही, पालनपुर, ईडर, संतरामपुर आदि का अन्वेषण भी किया और सभी जगह पीड़ित प्रजा का आक्रोश समान रूप से देखा। उसने अरावली पर्वतमाला को देखा और उस पर्वतमाला के समान चट्टानी प्रजा को नवीन शासन व्यवस्था अंग्रेजी राज्य से पूर्णरूपेण त्रस्त देखा परंतु शहरी साहूकार जागीरदारों को पाशविक व्यवस्था में भी लाभ तलाशते हुए देखा। उसने मेवाड़ के गौरवशाली सूर्यवंश और वनवासियों के मध्य त्रेतायुग से चले आ रहे साहचर्य के बंधन को अंग्रेजों की कुटिल चालों के आगे बिखरते देखा। उसका निर्मल मन बिलख उठा।

इसी बीच 1855 में लॉर्ड डलहौजी के समय में ही वन की मुख्य उपज सागवान को तथाकथित राष्ट्रीय संपत्ति मान लिया गया था और उस पर से वनवासियों का शताब्दियों से चला आ रहा नैसर्गिक अधिकार छीन लिया गया था, लेकिन सन 1865 में ‘भारतीय वन अधिनियम’ और उसके बाद 1867 में ‘इंपीरियल वन सेवा’ और 1869 में भारतीय वन विभाग के वैज्ञानिक कहे जाने वाले अंग्रेजी पुनर्गठन के बाद वन में वास करने वाले भोले भाले लोगों के लिए आम, शीशम, सागवान, चंदन आदि पेड़ों को काटना, उसका विपणन करना और लकड़ी का एक स्थान से दूसरे स्थान पर पारगमन करना तो असंभव हो ही गया बल्कि उनके आसपास बकरी चराना भी कठिन हो गया। 

कानून का डंडा ऐसा था कि वृक्षों को ठेकेदार काटे तो ठीक और भील काटे तो दंड।

 राष्ट्रीय संपत्ति सागवान के गगन छूते पेड़ों को भारी मात्रा में काटकर लंदन के घरों के सुंदर दरवाजे बनाए जा रहे थे।अंग्रेज जहाज पर जहाज बना सारी दुनिया को लूट रहे थे।

व्यवस्थित तरीके से भारत को, भारतीय समाज को,भारतीय कृषि व्यवस्था को निर्ममता पूर्वक अंग्रेजों द्वारा तोड़ा जा रहा था।

रही सही कसर सन 1880 तक आए छोटे-बड़े लगभग 12 अकालों ने पूरा कर दिया। अन्न का अभाव हो चुका था और जीवन बचाने के लिए लोग मोटे अनाज में खेजड़ी के पत्ते मिलाकर खा रहे थे। अंग्रेजों की अवैज्ञानिक कृषि नीति और वन संपदा के अत्यधिक उपयोग ने प्रकृति के संतुलन को पूरी तरह से बिगाड़ दिया था।

24 वर्ष का युवा गोविंद जब 11 अगस्त 1882 को प्रखर राष्ट्रवादी संत दयानंद सरस्वती जी से मिला उसका जीवन पूरी तरह परिवर्तित हो गया।

उनसे प्रेरणा पाकर वे बूँदी के दशनामी अखाड़े के तपोमय संत राजगिरि जी महाराज से दीक्षा लेकर उनके शिष्य बन गए।

धुन का धनी:-

गुरु से दीक्षा लेकर गोविंद गिरी ने स्वयं को समाज के लिए पूरी तरह समर्पित कर दिया। कोई नहीं जानता था कि कर्मयोगी कब सोता और कब जागता, कब खाता, कब पीता। वे दिन- रात एक जगह से दूसरी जगह की ओर चलते रहते थे। समय-समय पर उन्होंने अनेक चमत्कार भी दिखाए और धीरे-धीरे गोविंद गिरी से ‘गोविंद गुरु’ के नाम से श्रद्धा पूर्वक पुकारे जाने लगे।

 दुर्योग से 1956 में सदी का भयावहतम अकाल पड़ा। इस ‘छपनिया अकाल’ की यातना से पीड़ित प्रजा के लिए आशा की किरण बने गोविंद गुरु ने यथार्थ का बोध करने के लिए एक पाल से दूसरी पाल तक पूरे बागड़ का भ्रमण किया और अब उन्हें लगा कि समाज संगठित होने को आतुर हो चुका है।

संप सभा- सद्विचारों की अध्ययनशाला

जन भावनाओं को मुखर करने के लिए और वनवासी लोगों का साथ पाने के लिए गोविंद गुरु ने मानगढ़ धाम में एक विशाल आम सभा आयोजित की , इसे ही सम्प सभा का नाम दिया गया।इस विशाल सभा में उदयपुर ,डूंगरपुर, बांसवाड़ा, सिरोही, संतरामपुर, ईडर,पालनपुर रेवाकांठा समेत अनेकानेक रियासतों से प्रजा उमड़ पड़ी। मानगढ़ धाम पर विशाल हवन हुआ, भजन हुआ, कीर्तन हुआ और सत्संग प्रारंभ हुआ। इन सबका उद्देश्य समाज के नीचले वर्ग को साथ लेकर चलना था।

वनवासियों को स्वच्छता का महत्व बताना,दुर्व्यसनों से दूर करना,सत्य बोलना, शाकाहारी बनना, ब्रह्मचर्य,यज्ञादि का महत्व प्रतिपादित करना था।

प्रारंभिक आहुतियाँ:-

 समूचे बागड़ और उससे सटे क्षेत्रों में क्रांति की धारा प्रवाहित हो गई और कुशल प्रबंधन के साथ प्रत्येक पूनम और बीज के दिन सामूहिक हवन करते हुए कुरीतियों के विरुद्ध समाज को संगठित करने का परिणाम यह हुआ कि देखते ही देखते एक लाख अस्सी हज़ार भगत गुरु गोविंद के नेतृत्व में ‘भगत आंदोलन’ के अनुयायी बन गए। उनके साथ अपार जनसमूह ने जुड़कर स्वयं को सुधारने व शासन की सुधि लेने की ठान ली।

 शासन तंत्र के कान खड़े हो गए जनता द्वारा मद्य का परित्याग राजस्व में कमी का कारण बन गया, वहीं बेगार प्रथा का विरोध सामंत शाही को सदियों से प्राप्त अधिकारों में कटौती करने लगा। रियासतों को राजस्व की हानि होने लगी और साथ-साथ प्रजा के मौन से मुखर हो जाने से उन्हें भय ग्रस्त बना दिया। उन्होंने रियासत की आंतरिक सुरक्षा व आक्रमण से रक्षा का वचन देने वाले अंग्रेजों को पत्र लिखकर भीलों के संगठित होने को उनके लिए समान रूप से खतरा बताया।

महासमर:-

मैं हिमाद्री….पाषाण हूंँ लेकिन अब मैं वो देखने जा रहा था जिसने मुझे द्रवित कर दिया।

भगत आंदोलन की सफलता से प्रेरित होकर बांसवाड़ा जिले के मानगढ़ धाम और देवली के पास महादेव नाथ धामों के प्रमुख इकट्ठे हुए और गोविंद गुरु को अपनी कर्मभूमि पर लौटा लाने का निर्णय लेकर उनके पास पहुंँच गए। गोविंद गुरु ने उन्हें निराश नहीं किया और वे लौट आए।

गुरुदेव के पुनः आगमन से बांसवाड़ा, डूंगरपुर 

,रेवाकांटा, संतरामपुर सहित सीमावर्ती रियासतों में घबराहट फैल गई। वहीं अंग्रेज शासन में भी हलचल मच गई। राजाओं को अंदेशा हो गया कि गुरु गोविंद के नेतृत्व में भील प्रजा विद्रोह कर सकती है।

 वही अंग्रेजी शासन को लगने लग गया कि आंदोलन की आग में भूरेठिया भूत अर्थात अंग्रेजी भूत का आतंक जल उठेगा।

 मानगढ़ धाम पर पहुंचते ही अपार जनसमूह को अग्नि को साक्षी करते हुए गुरु गोविंद ने संबोधित करना शुरू किया और क्रांति का मंत्र फूँकते हुए कहने लगे कि स्वयं को संस्कारित करना, संगठित करना और आततायी शासन का प्रबल विरोध करना ही हमारा धर्म है, यज्ञ है, और हवन है। 

गुरुमुख से निकला ध्रुव पद “भूरेठिया नी मानूँ रे’ अर्थात ‘अंग्रेजों नहीं मानूंगा’ क्रांति का नारा बन गया और उनका यह पावन गीत ‘क्रांति गीत’ बन गया।

 गोविंद गुरु की पुकार पर उस पावन धरा पर तीन से चार लाख लोग इकट्ठे हुए और उनकी हुंकार की धमक रियासत की सीमाओं को पार करते हुए अंग्रेजों तक पहुंँच गई।

 क्षेत्र का भ्रमण कर गुरु महाराज ने जनता के साहस को टटोला और मानगढ़ धाम पर विशाल हवन का आयोजन करना ठान लिया।

इस आयोजन की उद्घोषणा से ही जहांँ रियासतों में हलचल मच गई, वही अंग्रेजी शासन की भी हवा निकल गई थी।

स्थितियांँ बदलती रहीं। प्रतिदिन बदलते घटनाक्रम में दोनों पक्षों में तनाव की स्थिति ला दी थी और इसी बीच 17 नवंबर 1913 का वह दिवस आ गया जब सरल मन वाले भील यज्ञ में लीन थे और अंग्रेज अपने सहयोगियों के साथ यज्ञ विध्वंस के समस्त कार्य योजना को अंतिम रूप दे चुके थे।

 सूर्योदय से पूर्व ही मेवाड़ भील कोर, 104 राइफल, गोधरा सैन्य पुलिस बड़ौदा से पहुंची। सैन्य कंपनी एवं स्थानीय रियासतों के सरदारों की फौजों ने मानगढ़ पहाड़ी की ओर बढ़ना प्रारंभ कर दिया।

 ब्रह्म मुहूर्त में सन्यासी के वेश में एक कपटी व्यक्ति को मानगढ़ धाम पर भेजा गया। जिसने छल पूर्वक भीलों का विश्वास तोड़ने के लिए गौ रक्त को महायज्ञ के धूणें में डाल दिया।

 समूची पहाड़ी पर हाहाकार मच गया प्रातः 8:30 बजे पहाड़ी को चारों तरफ से घेरे हुए अंग्रेजों द्वारा फायर खोल दिया गया और देखते ही देखते ढेरों मनुष्यों को मारकर पवित्र धूणीं में डाल दिया गया।

 भारतीय संस्कारों में पले बढ़े रियासतों के सरदारों के साक्षी में तथा उनके सहयोग से पवित्र यज्ञ कुंड को अपवित्र किया गया । 

यज्ञ स्थल पर लाशों का अंबार लग गया प्रातः 11:00 से पूर्व 15 सौ से अधिक जनजाति वीर मौत के घाट उतार दिए गए। जिनमें पूँजा धीरा की पुत्री कमला भी शामिल थीं। बाबरिया चन्ना, कोदर पारगी, वीराचनणा आदि शहीद हुए। यह एक भीषण नर संहार था। अंग्रेजी शासन ने इसे पूरी तरह दबा दिया परंतु इसकी गूँज उनके लिए हाय बनी।

 यज्ञ विध्वंस हो गया। यज्ञ के अधिष्ठाता गोविंद गुरु और उनके प्रखर सहयोगी पूंँजा धीरा पारगी सहित अधिकृत रूप से 900 व्यक्तियों को गिरफ्तार कर लिया गया। पोलिटिकल एजेंट ने भारत सरकार को मानगढ़ पहाड़ी से टेलीग्राम से एक संदेश भिजवा दिया कि मानगढ़ पहाड़ी पर भीलों द्वारा प्रतिरोध के बावजूद 11:00 बजे के लगभग आधिपत्य कर लिया गया और हमारी तरफ से केवल एक सिपाही घायल हुआ।

 हजारों लोगों के निर्मम और निर्दयता पूर्व नरसंहार की सत्यता को छुपा लिया गया और अवगत कराया गया कि मात्र एक दर्जन भील अनुयायी मारे गए, 900 हथियारबंद गिरोह को गिरफ्तार कर लिया गया। चारों तरफ से घिरे होने के बावजूद भील कैसे भागे किसी ने भी यह प्रश्न ना किया?

 शासन का सांप्रदायिक रूप

गोविंद गुरु और उनके साथियों पर अंग्रेजी सरकार द्वारा मुकदमा चलाया गया विशेष अदालत ने इन्हें दोषी माना और इन्हें फांसी की सजा सुनाई गई। पूंजा धीरा पारगी को उम्र कैद और शेष सभी व्यक्तियों को 3 वर्ष सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई। घटना घटित होने के मात्र 3 माह के भीतर 11 फरवरी 1914 को फैसला सुना दिया गया मानो गोली कांड से लेकर न्याय सुनाने तक के बीच की समस्त कार्यवाही सुनियोजित हो। अंग्रेजी सरकार ने इन सभी वीरों के खिलाफ मित्रता प्रचार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। धर्म के विरुद्ध बताया गया।

 अंग्रेजों के समस्त दुष्प्रचार विफल हो गए और जनजातीय समाज के योद्धाओं का दबाव इतना प्रबल था कि गुरु गोविंद को दिए गए मृत्युदंड से घबराए हुए ब्रिटिश राज के अधिकारियों ने मृत्युदंड को क्रियान्वित नहीं कर स्वयं ही उनके दंड को कम करने के प्रयास शुरू कर दिए। लॉर्ड हार्डिंग के पत्र के बाद 28 फरवरी 2014 को मात्र 15 दिन में अपील का निस्तारण कर दिया गया। गोविंद गिरी के मृत्युदंड को आजीवन कारावास में बदला गया, पूंजा धीरा के दंड में कोई कमी नहीं की गई और शेष सभी साथियों का दंड 3 वर्ष के सश्रम कारावास से घटाकर छह माह का सश्रम कारावास किया गया। आगे चलकर गोविंद गुरु के 20 वर्ष के आजीवन कारावास के दंड को घटाकर 10 वर्ष के कारावास में परिवर्तित कर दिया गया।

इसी दौरान भारत भूमि पर अंग्रेजों ने 13 अप्रैल 1919 के दिन वैशाखी के पावन अवसर पर अमृतसर में दशमेश गुरु की भक्ति के लिए इकट्ठे हुए भक्तों पर जलियांँवाला बाग में गोलियांँ बरसा दी लेकिन जनता जाग चुकी थी और प्रबल विरोध हुआ। राष्ट्रीय कांग्रेस की दृष्टि में मानगढ़ हत्याकांड ना आ पाया था लेकिन 6 वर्ष के बाद जलियांँवाला बाग में हुए नरसंहार ने सारी दुनिया का ध्यान अंग्रेजों की पाशविकता की ओर खींचा जिसके कारण आततायी की विश्वव्यापी निंदा हुई।

कारागार से मुक्त होने के बाद गुरुदेव रात दिन स्वराज और जनजातीय समाज के हित में संघर्षरत रहे। वर्ष 1927 आते-आते अविराम यात्रा के पथिक गुरुदेव को शारीरिक विश्राम की आवश्यकता होने लगी और उन्होंने कंबोई ग्राम की कुटिया को अपने पार्थिव जीवन के अंतिम समय की साधना स्थली बना लिया। तब से लेकर दिनांक 30 अक्टूबर 1931 को अंतिम सांस लेने तक गुरुदेव ने इसी कुटिया को भूमि को अपने पावन चरणों से कृतार्थ किया भारतीय मूल्यों की रक्षा करते हुए अपना संपूर्ण जीवन अर्पित करने वाले गोविंद गुरु को शत शत नमन।

मैं हिमाद्री……ऐसी अनगिनत कथाओं का साक्षी रहा हूँ।

गोविंद गुरु ने देश और समाज के हितार्थ जो कार्य किया उसे आने वाली संतति सदैव प्रेरित होती रहेगी और मेरा मस्तक इसी प्रकार गर्व से और उन्नत होता रहेगा।

Feature Image Credit: navjivanindia.com

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