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भारतीय ग्रंथों तथा पुराणों में देवी दुर्गा का वर्णन – भाग ९


पिछले अंकों में हम आपको मेधा ऋषि द्वारा महाकाली (पहला अध्याय), महालक्ष्मी महिषासुरमर्दिनी (दूसरे से चौथे अध्याय तक), तथा विभिन्न दैत्यों, राक्षसों, दानवों के मध्य युद्धों का वर्णन पढ़ा रहे थे। पिछले अंकों में आपने धूम्रलोचन, चंड-मुंड, रक्तबीज तह निशुम्भ वध के बारे में जाना। इस अंक में हम आपको शुम्भ वध की कथा के बारे में बताने वाले हैं।

अपने प्राणों से अधिक प्रिय भ्राता निशुम्भ की मृत्यु तथा सारी सेना का संहार होता देख शुम्भ ने अत्यंत कुपित हो माँ दुर्गा को चेतावनी देते हुए आरोप लगाया कि वह अनेक स्त्रियों के बल का सहारा लेकर युद्धरत है।

देवी ने असुरराज शुम्भ को उत्तर दिया कि वह अनेक स्त्रियाँ देवी की ही विभूतियाँ हैं तथा अंत में देवी में ही समाहित हो जाएँगी। ऐसा कहते ही ब्रह्माणी आदि समस्त देवियां अंबिका देवी के शरीर में लीन हो गईं। तदनंतर देवी तथा शुम्भ दोनों में, सभी देवताओं तथा दानवों के देखते-देखते भयंकर युद्ध छिड़ गया।

सहस्त्र बाणों की वर्षा, तीखे शस्त्रों एवं दारुण अस्त्रों के प्रहार के कारण यह युद्ध अति भयानक रूप लेता जा रहा था। देवी अम्बिका द्वारा दिव्य अस्त्रों के प्रहार को दैत्यराज शुम्भ ने उनके निवारक अस्त्रों द्वारा छिन्न-भिन्न कर डाला। इसी प्रकार जब शुम्भ ने अपने दिव्य अस्त्रों का प्रहार किया तब परमेश्वरी ने भयंकर हुंकार के उच्चारण आदि द्वारा सभी अस्त्र शस्त्र नष्ट कर डाले।

देवी को सैकड़ों बाणों द्वारा आच्छादित देख जब असुर प्रसन्न हुआ तब क्रोधित देवी ने भी अपने बाण से उसका धनुष नष्ट कर दिया। धनुष नष्ट होने पर दैत्यराज ने शक्ति प्रहार किया जिसे देवी ने चक्र द्वारा काट गिराया। तपश्चात दैत्यों के स्वामी शुम्भ ने ढाल तथा तलवार द्वारा देवी पर आक्रमण किया जिसको माँ चंडिका ने अपने तीखे बाणों द्वारा नष्ट कर डाला। धनुष के नष्ट होने के पश्चात् असुरराज ने देवी अम्बिका के वध हेतु लिये भयंकर मुदगर उठाया किन्तु देवी ने अपने तीक्ष्ण बाणों से उसका मुदगर भी काट डाला।

अचानक असुरराज देवी को जकड कर आकाश में गमन कर गया। अब आकाश ही देवी चंडिका का युद्ध स्थल बन चूका था। असुरराज तथा देवी चंडिका का महायुद्ध, सिद्ध ऋषियों तथा मुनिदेवों को विस्मय सागर में गोते दिला रहा था। देवी अम्बिका ने आकाश में शुम्भ के साथ मल्लयुद्ध में लीन होते हुए पृथ्वी पर ला पटका। धराशायी होने के पश्चात भी वह दुष्टत्मा दैत्य, पुन: दुगने वेग से देवी चंडिका की ओर झपटा किन्तु देवी ने त्रिशूल से उसकी छाती पर प्रहार कर उसको गंभीर रूप से घायल कर दिया। देवी के शूल की धार से घायल असुराज के प्राण-पखेरू उड़ गए। समुद्रों, द्वीपों तथा पर्वतों सहित, समूची पृथ्वी के कम्पन से सभी देवगणों को यह ज्ञात हो गया कि असुरराज का अंत हो गया है।

शुम्भ की मृत्युपरांत उत्पातसूचक मेघ तथा उल्कापात शांत हो गए, पवित्र वायु का संचार होने लगा, सूर्य की प्रभा उत्तम हो गई एवं नदियों ने पुनःअपना मार्ग बदल लिया। अग्निशाला की शांत ज्वाला अपने-आप प्रज्वलित हो उठी तथा सम्पूर्ण दिशाऒं के भयंकर शब्द शांत होते जा रहे थे।
सम्पूर्ण देवताओं का हृदय प्रफुल्लित हो गया, गंधर्वगण मधुर गीत गाने लगे तथा अप्सराएँ नृत्य करने लगीं। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि उस दुरात्मा दैत्य देव की मृत्यु के समाचार सुन सम्पूर्ण जगत् प्रसन्न एवं पूर्ण स्वस्थ हो गया है।

इस प्रकार, श्रीमार्कंडेय पुराण में सावर्णिक मन्वंतर की कथा के अंतर्गत, देवीमाहाम्य में, शुम्भ-वध नामक, दसवां अध्याय पूरा हुआ।

अब तक आपको यह ज्ञात हो चूका होगा कि श्रीमार्कण्डेयपुराण में देवी महात्म्य के अंतर्गत दैत्यों, दानवों, असुरों तथा राक्षसों के विनाश हेतु माँ दुर्गा के अनंत अवतारों का वर्णन मिलता है। यह कहा जा सकता है कि उस काल में दैत्यों, दानवों, असुरों तथा राक्षसों की अनंत संख्या तथा असीमित बल होने के कारण आदिशक्ति ने अनेकानेक रूपों में प्रकट हो इन के तांडव से मुक्ति दिलायी।

इस संपूर्ण कथाक्रम में धूम्रलोचन, चंड-मुंड, रक्तबीज तथा शुंभ-निशुंभ जैसे महाबली तथा मायावी असुरों का विनाश देवी के विभिन्न रूपों द्वारा किया गया था। महाकाली को विनाशक तथा तामसिक, महालक्ष्मी को संरक्षक तथा सात्विक एवम् महासरस्वती को सृष्टिकर्ता तथा राजसिक रूप में त्रिदेवी का नाम दिया गया है।

देवी महामाया की भगवान के एक दिव्य शक्ति स्वरुप की अवधारणा पौराणिक काल से मानव आलेखों तथा स्मृतियों के रूप में मौजूद है। भारतीय वेदों में, जो कि छ हज़ार ईसा पूर्व की घटनाओं का संदर्भ देते हैं, ब्रह्मांड की दिव्य शक्तियों में देवी स्वरुप का वर्णन किया गया है।

हमने यह भी पढ़ा था कि बुराई पर अच्छाई के विजय के संबंध में तीन प्राथमिक धार्मिक ग्रंथ, चंडी पाठ, रामायण तथा महाभारत देवी दुर्गा का वर्णन करते हैं। अभी तक हमने चंडी पाठ की कथाओं का वाचन किया था। इन कथाओं में मेधा ऋषि महादेवी तथा विभिन्न दैत्यों, राक्षसों, दानवों के मध्य युद्धों का वर्णन करते हैं। इन कथाओं का वर्णन महाकाली (प्रथम अध्याय), महालक्ष्मी (द्वितीय से चौथे अध्याय तक), और महासरस्वती (पांचवें से तेहरवें अध्याय तक) में उल्लेखित है।

दुर्गा शब्द और संबंधित शब्द वैदिक साहित्य में प्रकट होते हैं, जैसे कि ऋग्वेद के देवी सूक्त, ऋग्वेद 10.125.3 – 10.125.8 तथा 1.90 में दुर्गा सूक्त के रूप में। मुंडक उपनिषद, जो लगभग ५वीं शताब्दी ईसा पूर्व की है, के1.2.4 पद्य में काली, के रूप में पाया जाता है।

नारद पुराण भी दुर्गा, महाकाली, भद्रकाली, चंडी, माहेश्वरी, लक्ष्मी, वैष्णवी और ऐन्द्री के रूप में महालक्ष्मी के शक्तिशाली रूपों का वर्णन करता है। स्कंद पुराण के लक्ष्मी तंत्र और लक्ष्मी सहस्रनाम में, लक्ष्मी को आदिम देवी और दुर्गा को लक्ष्मी के नामों में से एक का रूप दिया गया है। ग्रंथों में यह भी बताया गया है कि दुर्गमासुर राक्षस के वध पश्चात् उन्हें यह नाम मिला।

दुर्गा शब्द प्राचीन वैदिक संस्कृत ग्रंथों जैसे महाभारत में भी पाया जाता है। महाभारत के युधिष्ठिर और अर्जुन दोनों पात्र दुर्गा की स्तुति करते हैं। देवी दुर्गा हरिवंश में विष्णु की स्तुति के रूप में और प्रद्युम्न प्रार्थना में प्रकट होती है। निश्चित रूप से,महाग्रंथ महाभारत तथा रामायण में देवी दुर्गा का सन्दर्भ किसी को भी यह विश्वास दिला सकता है कि नवरात्रि उत्सव का समय चंडी पाठ के लेखन से भी अधिक पुरातन हो सकता है।

कुछ विद्वान अनुमान लगाते हैं कि भगवान राम की इस कथा का पहला वर्णन ईसा पूर्व 5114 के आसपास हुआ था किन्तु दूसरों का तर्क है कि श्रीराम कथा 2040 ईसा पूर्व की है। युग जो भी हो, रामायण, चंडी पाठ की तरह, बुराई पर अच्छाई पर विजय पाने की कहानी है। जहाँ देवी दुर्गा की कथा अधिक पौराणिक तथा प्रतीकात्मक प्रतीत होती है, वहीं श्रीराम की कथा को सत्य माना जाता है।

दुर्गा पूजा की सर्वलोकप्रिय कथा रामायण में भी है जहाँ अयोध्या के भगवान राम ने रावण के विरुद्ध युद्ध में देवी दुर्गा का आह्वान किया था। यधपि देवी की पारंपरिक रूप से वसंत ऋतु में पूजा की जाती थी किन्तु युद्ध की आकस्मिकताओं के कारण, श्रीराम को शरद ऋतु में देवी दुर्गा का आह्वान करना पड़ा, इसलिए श्री द्वारा देवी का अकालबोधन किया गया था।

हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, 23 दिसंबर तथा 21/22 जून या वसंत विषुव (ग्रीष्म संक्रांति) के बीच की समय अवधि ही देवताओं तथा देवी को जागृत हेतु शुभ समय है। यह समय उत्तरायण तथा लोकप्रिय रूप से देवउठान के रूप में जाना जाता है।

हिंदू शास्त्रों द्वारा निर्धारित देवी दुर्गा की वास्तविक पूजा इसलिए चैत्र मास में आयोजित की जाती है। वहीं शरद ऋतु या दक्षिणायन का समय हिंदू देवी-देवताओं के विश्राम का समय होता है।

आपको यह ज्ञात होना भी आवश्यक है कि अकालबोधन शब्द कृतिबास की रामायण में है न कि वाल्मीकि रामायण (मूल रामायण) में। “अकाल” शब्द का अर्थ है “असामयिक” तथा “बोधन” शब्द का अर्थ है “जागृति” या “आह्वान”।

सन्दर्भ-

  • https://www.symb-ol.org/app/download/11179828/Devi+Mahatmyam.pdf
  • an article by Anasuya Swain, Orissa Review.
  • https://www.louisianafolklife.org/LT/Articles_Essays/NavaratriStory.html
  • http://aranyadevi.com/aranyadevi/pdf/Durga_Saptashati.pdf
  • https://sanskritdocuments.org/doc_devii/durga700.html?lang=sa
  • https://lookoutandwonderland.com/shop/2020/3/30/nx26hcepfkuellv69balm6ebnigdzq
  • Puranic Encyclopedia: A Comprehensive Work with Special Reference

Image credit: picxy


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