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विंध्याचल का नाभिस्थान – तपोभूमि देवबल्ड़ा

विगत छः वर्षों से देवांचल धाम देवबल्ड़ा बिलपान, मेहतवाड़ा जिला सिहोर मध्यप्रदेश में अद्भुत पुरातात्विक महत्व के स्थल पर निरंतर खुदाई चल रही है और यहां पुरातात्विक महत्व की सुंदर शिव, पार्वती, विष्णु व वाराअवतार आदि की मूर्तियां मिल रही है। विंध्याचल की पहाड़ीयों के बीचोंबीच यह सुंदर पर्यटन स्थल स्थित है। करीब 1000-1200 वर्षों का इसका इतिहास माना जा रहा है। वैसे पुरातत्व विभाग व इतिहासकारों ने इस स्थल पर अभी सटीक ज्यादा लिखा व जानकारी जारी नहीं की है लेकिन मध्यप्रदेश के इंदौर-भोपाल रोड़ मेहतवाड़ा से 7-8 किलोमीटर पर ही यह पुरातत्व महत्व का स्थान बेहद महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल व पुरातात्विक महत्व का स्थल बनने वाला है। यहां दिनोंदिन दर्शनार्थियों व पर्यटकों की संख्या बढ़ रही है।

इस धार्मिक व पुरातात्विक महत्व के स्थान के विषय में सर्वप्रथम डॉ तेजसिंह सैंधव( इतिहासकार व पूर्व विधायक) ने महान पुरातत्वविद व पद्मश्री व्ही. एस. वाकणकर के नेतृत्व में पुरातात्विक दृष्टि से शोध कार्य शुरू किया था और इस स्थान पर “तपोभूमि देवबल्ड़ा” नामक पुस्तक लिखी है। उक्त पुस्तक में इस स्थान पर संपूर्ण पुरातात्विक व धार्मिक दृष्टि से प्रकाश डाला गया है व शोधपूर्ण पुस्तक लिखी गई है। डॉ. सैंधव व ठा. ओमकार सिंह भाटी ग्राम बिलपान के अथक प्रयासों के कारण ही अब जब यहां बड़े स्तर पर पुरातत्व विभाग कार्य कर रहा है तो सभी बातें सामने आ रही है। इस स्थल के विषय में “वाकणकर जी ने कम से कम 11 मंदिरों के अस्तित्व में होने की संभावना कई वर्ष पहले की थी।” जो कि आज सच सिद्ध हो रहा है। यह तथ्य कोई भी इतिहासकार व पर्यटक यहां आकर वर्तमान में अपनी आँखों से सहज ही देख सकता है।

डॉ सैंधव अपनी पुस्तक में इस स्थल पर शोधकार्य करते हुए लिखते है कि “इस स्थान पर नेवज नदी का उद्गम एवं उसके तट पर लक्ष्मी-पार्वती की संयुक्त प्रतिमा के गर्भ से जन्म लेते हुए भगवान विष्णु के अवतारों का दृश्य सम्पूर्ण भारत में अद्भुत है। हिंदू धर्म के लगभग सभी पंथों का यहाँ पर अनूठा संगम है। यह स्थान शैव मत, शाक्त परम्परा, वैष्णव मत, जैन मत, कौल मत अथवा अघोर पंथ आदि के अनुयायियों की साधना स्थली रहा है। यहाँ बौद्ध मत के अवशेष प्राप्त नहीं हुए हैं, किन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि उत्खनन आदि शोध कार्यों से बौद्ध धर्म के भी प्रमाण यहाँ निश्चित रूप से मिलेंगे। विभिन्न देवताओं का पूजा स्थल होने के कारण यह देव भूमि और फिर देवबल्ड़ा नाम से प्रसिद्ध हुआ है। ”

वहीं इतिहासकार डॉ. नागाइज ने भी अपने निबंध ‘देवास के परमार कालीन मंदिर एवं शिल्प कला’ में देवबल्ड़ा में ब्रह्मा मंदिर होने की बात कही है।

देवबल्ड़ा में प्रति वर्ष महाशिवरात्रि पर तीन दिनों तक भव्य शिवरात्रि मेला लगता है जिसमें आसपास के करीब 50 गाँवों व नगरों की जनता शामिल होती हैं। यह दृश्य अद्भुत लोकसंस्कृति व ग्राम्य जीवन का संगम रहता है। सावन माह में इस स्थल के आसपास हरियाली ही हरियाली रहती है और प्रकृति अपने पूरे रंग में रहती है।
तीर्थ स्थान देवबल्ड़ा के आस-पास के गाँव में यह लोक गाथा व्याप्त है कि यहाँ प्रसिद्ध राजा मोरध्वज का राज्य था और नेवज नदी के बायें तट पर बसे ग्राम मेहतवाड़ा में राजा मोरध्वज का विशाल महल था। मेहतवाड़ा में प्रवाहित नेवज नदी के घाट को आज भी महल घाट या मेल घाट कहा जाता है। इसी घाट पर राज परिवार के सदस्य स्नान करने आते थे।

चारों ओर से विंध्याचल पर्वत माला के नैसर्गिक सौंदर्य से परिपूर्ण यह देवबल्ड़ा नामक यह स्थान धार्मिक, पुरातात्विक, पौराणिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, लोकसंस्कृति, पर्यावरण, पर्यटन आदि की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह मध्यप्रदेश के सिहोर एवं देवास जिलों की सीमाओं पर विंध्याचल पर्वत माला के मध्य में स्थित है। यहां सांस्कृतिक व पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण विकास किया जा सकता है और पुरातात्विक दृष्टि से भी यह मध्यप्रदेश के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है।

वैसे यहां अभी निरंतर मध्यप्रदेश पुरातत्व विभाग की खुदाई चल रही है और आश्चर्य जनक मूर्तियां मिल रही है। आगे ओर ऐतिहासिक तथ्य सामने आने वाले हैं। यह स्थल युवा इतिहासकारों व पुरातत्व के प्रति रुचि रखने वालों के लिए भी एक महत्वपूर्ण स्थल है।

अभी तो इस स्थान तक पहुंचने के लिए पक्का रोड़ भी नहीं है जो कि इंदौर-भोपाल रोड़ से यह सिर्फ 7-8 किलोमीटर ही है। उम्मीद है जिम्मेदार प्रशासनिक अधिकारी जल्द इस ओर ध्यान देगे। प्राकृतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक , इतिहास व पुरातत्व की दृष्टि से भी यह स्थान बहुत ही अच्छा पर्यटन स्थल बन सकता है। इस स्थल पर यत्र तत्र फैली व समय समय पर खुदाई में प्राप्त हुई ऐतिहासिक मूर्तियों को संरक्षित व सुरक्षित रखने का कार्य जन सहयोग व आसपास के गाँव वालों ने काफी महत्वपूर्ण व ऐतिहासिक कार्य किया है।

परमार कालीन ऐतिहासिक तथ्यों के खुदाई में मिल रहे अवशेष 2016 से प्रारंभ हुआ था। इस खुदाई के काम में अभी तक 8-10 मंदिर मिल चुके हैं, जिनमें सबसे बड़ा शिव मंदिर आकर्षण का केंद्र है। मां नेवज नदी के उद्गम स्थल के पुरातात्विक धरोहर देवांचल धाम देवबल्ड़ा बिलपान में खुदाई के दौरान परमार कालीन मंदिरों के अवशेष मिल रहे हैं। हाल ही में यहां पर दस मंदिर की शृंखला मिली है जिसमें चौथा मंदिर मिला है वह अब तक मिले मंदिरों में सबसे बड़ा प्रतीत हो रहा है।

मध्यप्रदेश पुरातत्व विभाग का कहना है कि देवबड़ला परमार कान में प्रसिद्ध संस्कृतिक केंद्र था। यहां परमार काल यानी 10वीं 11वीं शताब्दी में लगभग 11 मंदिरों का निर्माण हुआ था। मध्य प्रदेश पुरातत्व विभाग अब इन मंदिरों को खोदकर निकाल रहा है और उन्हें मूल स्वरूप में संरक्षित कर रहा है। साथ ही मध्यप्रदेश पुरातत्व विभाग का अनुमान है कि करीब 300 साल पहले यानी 18वीं सदी में ये मंदिर भूकंप के कारण धराशायी हुए या किसी आक्रमणकारी के हमले में गिराए गए। समय के साथ पहाड़ी इलाके में बारिश और मिट्‌टी के कटाव के कारण साल दर साल इनके ऊपर मिट्‌टी की परत जमती चली गई। ये जमीन के नीचे दब गए। लेकिन इस स्थल को देखने व इसके आसपास भ्रमण करने से पता चलता है कि यहां सनातन धर्म व संस्कृति का केंद्र रहा है और यदि पुरातत्व विभाग, संस्कृति व पर्यटन मंत्रालय इसका अच्छे से रखरखाव करता है तो यह पुनः ही अपने खोये वैभव को प्राप्त कर लेगा व राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पुरातत्व की दृष्टि से विशेष महत्व का स्थल बन सकता है।

वहीं इन दिनों सीहोर जिले के देवबड़ला के प्राचीन शिवालय के बारे में काफी लोग सर्च कर रहे हैं। यहां के स्थानीय निवासी व मेरे अनुज कु. विजेंद्रसिंह भाटी बिलपान व 2016 से पुरातन अधिकारी जीपी सिंह चौहान के नेतृत्व में लगातार खुदाई का काम चल रहा है, आप दोनों के कहे अनुसार, ‛यहां आये दिन खोजी पत्रकार व पर्यटकों की संख्या बढ़ती जा रही है। कई लोग भोपाल-इंदौर से देवबड़ला इसकी दूरी भी खोज रहे हैं। जावर क्षेत्र के घने जंगल के बीच स्थित प्राचीन देवबड़ला सीहोर जिले की एक धरोहर है। देवबड़ला में प्राचीन भगवान भोलेनाथ का मंदिर है, जो हरियाली से घिरा हुआ है। यहां आने वाले पर्यटकों को यह स्थान बार-बार अपनी ओर आकर्षित करता है। यहीं कारण है कि हर दिन यहां पर्यटकों की संख्या बढ़ रही है। पहले यहां आसपास गांव के लोग ही पहुंचते थे, लेकिन जब से पर्यटन विकास निगम ने यहां पर पुरा धरोहर को सहेजने का काम शुरू किया है, पर्यटकों की संख्या भी बढ़ने लगी है। अब यहां प्रदेशभर से लोग घूमने आते हैं, यहां के खूबसूरत पलों को मोबाइल में कैद करते हैं।

ऐतिहासिक देवाचंल धाम का इतिहास करीब 1000-1200 साल पुराना है। साल 2016 में दुर्लभ प्रतिमाएँ होने की जानकारी मिलने के बाद पुरातत्व विभाग ने जनवरी 2017 में खुदाई शुरू की थी। इसमें परमाकालीन दो मंदिर मिले थे। इन मंदिरों से 11वीं, 12वीं शताब्दी की 20 प्राचीन व दुर्लभ प्रतिमा मिली थी। मंदिर क्रमांक एक शिव मंदिर और मंदिर क्रमांक दो विष्णु मंदिर से मिली प्रतिमा हिन्दू देवी देवताओं की है। इनमें बह्मादेव, गौरी, भैरव, भूवराह, देवी लक्ष्मी, योगिनी और शिव नटराज की प्राचीन प्रतिमाएँ शामिल थी। पुरातत्व विभाग वर्तमान में यहां 51 फीट ऊंचाई के दो मंदिर का निर्माण करा रहा है, जिसमें एक का काम पूर्ण हो गया है। उक्त स्थल के पुरातात्विक महत्व को दृष्टिगत रखते हुए मध्यप्रदेश पुरातात्विक विभाग ने भी अपने जर्नल ‛पुरातन’ अंक 18 के मुख्य आवरण पर प्रथम शिव मंदिर का छायाचित्र लगाया है। यह मंदिर व यहां पर प्राप्त मंदिर अवशेष भूमिज शैली के है।

हाल ही में मिले चौथे मंदिर के अवशेष भी अन्य मंदिरों की तरह आसपास बिखरे हुए हैं। पुरातत्व विभाग से जुड़े अधिकारी डॉ यादव बताते हैं यहां पर मिले यह सभी मंदिर भूस्खलन के कारण टूट कर गिरे प्रतीत होते हैं। एक अन्य कारण यह भी हो सकता है कि मंदिरों को बनाने में लोहे के क्लेम का प्रयोग किया गया था। जो समय के साथ जंग लगने से टूट गए और मंदिर गिर गया।

पत्रिका व दैनिक भास्कर समाचार पत्र में प्रकाशित खबर के अनुसार पुरातत्व विभाग मध्यप्रदेश के आयुक्त शिल्पा गुप्ता ने जानकारी देते हुए बताया कि खुदाई में मंदिरों के जो अवशेष मिले उन्हें दोबारा उसी रूप में संरक्षित किया जा रहा है जो मंदिर बन गया है वह बेहद खूबसूरत है। आने वाले समय में सभी मंदिरों का पुनर्निर्माण किया जाएगा यह स्थल पुरातत्व की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है।

यहां पर खुदाई में मिली महत्वपूर्ण व ऐतिहासिक मूर्तियों का अच्छे से संग्रहालय बनाकर रखा जाता है तो भी पर्यटक बढ़ सकते है और यह स्थल विश्व धरोहर के लिए महत्वपूर्ण बन सकता है। साथ ही सनातन संस्कृति, धर्म , पुरातात्विक महत्व व पर्यटन का राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय केन्द्र बननी प्रबल संभावना है।

अंत में मैं कहना चाहता हूं कि यह तपोभूमि ही है। क्योंकि जब भी आप यहां पहुंचेगे व शांति से बैठकर ध्यान करेंगे तो आपको ऋषियों व मुनियों के तप का स्पष्ट आभास होगा। आप एक अलग ही ऊर्जा का अनुभव करेंगे। कला की श्रेष्ठ कृति इन मूर्तियों में अद्भुत आकर्षण सहज देखने से ही अनुभव होता है। यहां हर बार दर्शन करने से मन में शांति का अनुभव होने लगता। यह तपोभूमि जल्द ही अपना खोया हुआ गौरव प्राप्त करने जा रही है।

संदर्भ ;-

1. तपोभूमि देवबल्ड़ा, डॉ. तेजसिंह सैंधव, अ.भा. इतिहास संकलन योजना 2016

2. पुरातन, पंकज राग, जर्नल अंक-18 मध्यप्रदेश पुरातत्व विभाग मध्यप्रदेश 2020

3. https://www.abplive.com/states/madhya-pradesh/mp-dev-badla-historical-evidences-temples-paramara-period-4-temples-found-ann-2195278

4. https://www.patrika.com/sehore-news/archaeology-dept-discovers-devanchal-dham-devbadla-shiv-mandir-jawar-7481440/

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