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रमता जोगी – आज़ाद के अनसुने संस्मरण

आज गाँव में ठाकुर मलखान सिंह के आवास पर कथा का आयोजन किया गया था। सुबह से मलखान सिंह के घर पर भीड़ इकट्ठी होनी शुरू हो गयी थी। ब्रह्मचारी जी ठाकुर जी के यहाँ आकर बैठे और प्रवचन शुरू कर दिये।

सभी तल्लीनता से ब्रह्मचारी जी के रामायण वचन का सुस्वाद ले रहे थे। ब्रह्मचारी जी अपने गुटके से एक चौपाई सुनाते थे और फिर उसका अर्थ सभी को समझाते थे। मण्डली मग्न थी और ऐसे मग्न हो गयी कि कब शाम हुई पता ही नहीं चला।

आज़ाद को अचानक ख्याल आया कि आज तो मास्टर जी के यहाँ से बुलावा आया था और उनको शाम को वहाँ पहुँचना था।

“शायद आज रात को फिर मास्टर के यहाँ ही निवास करना होगा।” सोचते हुए ब्रह्मचारी जी उठ खड़े हुए।

“चलों भगतो, बाकी कथा किसी और दिन।”

मन तो किसी का नहीं था जाने का किन्तु ब्रह्मचारी जी से कौन ज़िद करता, अतः कथा समाप्त हुई। ब्रह्मचारी जी ने प्रसाद बांटा और ठाकुर साहब को अपने पास बुलाया।

“ठाकुर साहब, मुझे आपकी साइकिल की ज़रुरत पड़ेगी।”

“इसमें पूछने की क्या बात है महाराज?” ठाकुर साहब ने हाथ जोड़ते हुए कहा।

जब सभी भगत चले गये तो आज़ाद ने रामकृष्ण को इशारा किया कि वो भी अपनी साइकिल ले आये।

रामकृष्ण जब साइकिल लेकर आया तो आज़ाद ने कुछ नहीं कहा और साइकिल पर सवार होकर गाँव से बाहर आ गये।

रामकृष्ण ने कुछ नहीं पूछा और एक सच्चे सेवादार की तरह उनके पीछे-पीछे आ गया।

रात होते-होते जब आज़ाद मास्टर जी के यहाँ पहुँचे तो वहाँ तीन तिलंगे पहले से मौजूद थे। मास्टर जी ने एक संगठन के बारे में आज़ाद को सूचनाओं से अवगत कराया और बोले,

“वहाँ पर किसी को कोई शक तो नहीं हो रहा है?”

“नहीं मास्टर जी, अब तो कभी कभी मुझे भी लगने लगता है कि मैं सच में बाबा ही बन गया हूँ।”

“मुझे भी यही लग रहा है।” मास्टर जी गंभीर मुद्रा में बोले।

आज़ाद चौंक गये, बोले,

‘मैं मज़ाक कर रहा था मास्टर जी।”

“किन्तु मैं नहीं आज़ाद। तुम कभी भूलना नहीं कि अपने साथियों के जाने के बाद अब सारी ज़िम्मेदारी ही तुम पर है। देश की आँखें तुम पर लगी हुई है।”

“मैं समझता हूँ मास्टर जी।” आज़ाद थोड़ा दुखी थे।

“मुझे तुम पर पूरा यकीन है कि तुम्हारे होते हुए अब संगठन पर कोई आंच नहीं आ सकती।”

‘मास्टर जी, कसम है मुझे अपने साथियों की। मेरा एक-एक पल देश के लिए कुर्बान होने को आतुर है। बस मेरे हाथ आपने बाँध रखे हैं।”

“मैंने तुम्हारे हाथ नहीं बांधे आज़ाद, परिस्थिति ठीक होते ही मैं स्वयं तुम्हे लेने आऊंगा”

“मैं इंतज़ार करूँगा मास्टर जी।”

“अगले हफ्ते भगत सिंह आ रहे हैं और वो तुमसे मिलना चाहते हैं। उनके आते ही मैं उनको लेकर आश्रम आऊंगा। उनके पास संगठन से सम्बंधित भविष्य के कुछ कार्यक्रम हैं जिनमे वो तुम्हारा सहयोग चाहते हैं।”

“मैं तैयार हूँ।”

“मुझे पता है आज़ाद।”

“चलो अब खाना खालो, तुम्हारी भाभी ने तुम्हारे लिए तुम्हारी पसंद की…..” मास्टर जी की बात अधूरी रह गयी।

“कढ़ी बनायीं है भाभी ने?” आज़ाद बात काटते हुए बोले।

“पर पतीले में नहीं मिलेगी दाऊ।” पीछे से आवाज़ आयी तो आज़ाद ने मुड़ कर देखा कि मुन्नी भाभी हाथ में थाली और गिलास लिए खड़ी थी।

सभी साथियों ने खाना खाया और संगठन से सम्बंधित विचार-विमर्श करते हुए सो गये।

दूसरे दिन जब ब्रह्मचारी जी, रामकृष्ण के साथ झाँसी से लौट रहे थे तो शाम होने को थी। मास्टर जी के यहाँ से सुबह निकलते-निकलते दोपहर का ही समय हो गया था। रास्ते में रुकते हुए जब सातार के करीब पहुँचे तो उनको सामने आते हुए दो पुलिस वाले दिखायी दिये। जैसे-जैसे ब्रह्मचारी जी उनके करीब गये पुलिस वालों ने भी अपनी साइकिल की रफ़्तार धीमी कर दी। नज़दीक आते-आते दोनों पुलिस वालों अपनी साइकिल को रास्ते पर आड़ा कर ब्रह्मचारी जी का रास्ता रोक लिया।

एक सिपाही ब्रह्मचारी को घूरते हुए बोला, “तुम आज़ाद हो ना?”

ब्रह्मचारी जी का ऐसे पुलिस वालों से रोज़ पाला पड़ता था उर उनको पता था कि उनसे कैसे निपटना है। वो साइकिल से उतरे और बोले,

“साधु तो हमेशा आज़ाद होते हैं दीवान जी। उनका कहाँ कोई स्थायी ठिकाना होता है? रमता जोगी बहता पानी जैसा जीवन होता है उनका। आज यहाँ तो कल वहाँ। हम किसी बंधन में बंधने वाले नहीं।”

कहते-कहते ब्रहमचारी जी मुस्कुरा दिये।

“कुछ ज़्यादा सयाने लगते हो मुझे तुम।”

दूसरा सिपाही घूरते हुए बोला।

“क्या बताएं दीवान जी, देस-दुनिया घूमते-घूमते इतना अनुभव तो हो ही जाता है।”

“रात होने को है, ड़र नहीं लगता तुम्हे जंगल में?”

“हम तो खुद जंगल-जंगल फिरते रहते हैं। अच्छे-बुरे सभी लोगों से पाला पड़ता है। मेरे लिए क्या तो चोर और क्या तो ड़कैत और क्या तो पुलिस। मेरे लिए तो सब बराबर हैं। सभी मेरे सामने साष्टांग दंड़वत होकर, प्रणाम कर, आशीर्वाद लेकर चले जाते हैं। आप कीजिये प्रणाम तो आपको भी मिलेगा साधु महाराज का आशीर्वाद।”

आज़ाद अब ठिठोली में मूड़ में आ गये थे।

“कैसा आशीर्वाद?”

“अच्छा अब बहस ना कीजिये और जाने दीजिये हमे। बजरंगबली का चोला चढ़ाने का समय हो रहा है।”

“कौन सा मंदिर है तुम्हारा?” उस सिपाही ने पूछा।

“अरे बताया ना कि पैर में चक्र है एक जगह के होकर नहीं रह सकते हम।”

“लेकिन इस समय कहाँ मंदिर है?” सिपाही जान ही नहीं छोड़ रहे थे।

“सातार नदी के पास है आश्रम हमारा। आप भी आ जाइये किसी दिन।”

“वो तो हम आयेंगे ही पर आज तो हमारे बड़े सहाब आपका दर्शन कैंप में करना चाहते हैं।”

“अरे भाई, सुना नहीं तुमने कि हमारा हनुमान जी को चोला चढ़ाने का समय हो गया है।”

“हमें खबर मिली है आप अपने आश्रम में क्रांतिकारी लोगों को रखते हैं।”

अब आज़ाद चौकन्ने हो गये। मामला गड़बड़ था और इसे अब जल्दी निपटाना ज़रूरी था।

“क्रांतिकारी??? यह कौन से लोग हैं? हमारा आश्रम कोई धर्मशाला थोड़े ही है कि हम किसी को ठहराएंगे दीवान जी।”

सिपाही की नज़र आज़ाद के थैले पर थी और थैले में था आज़ाद का माउज़र।

आज़ाद ने देख लिया कि सिपाही की नज़र उनके थैले पर है।

बात भटकाने के लिए आज़ाद ने उस सिपाही से पूछा, “कौन लोग होते हैं ये कान्तिकारी? क्या करते हैं?”

सिपाही ने थैले से नज़र हटायी और बोला, “अरे वही साले पागल जो समझते हैं कि पिस्तौल और राइफल से खून-खच्चर करके आज़ादी-फाजादी मिल सकती है।”

“होंगे दीवान जी, हमें तो अपनी एक कटोरी दाल-चावल से मतलब है।”

“चलो कोई बात नहीं, दाल-चावल ही सही। आप से मिलकर हमारे बड़े साहब प्रसन्न हो जायेंगे।”

“दीवान जी आपसे कहा तो कि चोले का समय हो गया है और हमाये बजरंगबली से बड़े तो नहीं है ना आपके दरोगा जी।” ब्रह्मचारी जी अब थोड़ा-थोड़ा तैश दिखाना शुरू कर दिया था।”

“अरे चलो महाराज।”

“दीवान जी मैं कह रहा हूँ कि चोले का समय हो रहा है और आप जिद किये जा रहे हो। आप लोगों को समझ में नहीं आ रही हमाई बात?”

“तुम मानोगे नहीं? सिपाही ने गुस्सा दिखाया।

“बजरंगबली के अलावा हम किसी की नहीं मानते।” ब्रह्मचारी जी जरा भी विचलित नहीं हुए थे।

“तुम चलते हो या ज़बरदस्ती ले जायें?” सिपाही ने आज़ाद की साइकिल को पकड़ने को कोशिश की।

“है हिम्मत?” कहते-कहते ब्रह्मचारी जी ने सिपाही की साइकिल को इतनी ज़ोर का झटका दिया कि एक सिपाही तो अपनी साइकिल लिए मुँह के बल गिर पड़ा और दूसरा मुँह बाए भौंचक्का सा खड़ा रह गया। भारी-भरकम, पहलवान जैसे ब्रह्मचारी बाबाज़ी की लाल हो रही आँखें देख उसे सांप सा सूंघ गया था। ब्रह्मचारी जी अपनी साइकिल पर चढ़े और आश्रम की और बढ़ गये।

अंधेरा घिरने लगा था। कुटिया पर पहुँचते-पहुँचते रात हो ही गयी थी। आज़ाद सोच में थे। पुलिस का आगमन इस इलाके में हो चुका था। ब्रह्मचारी बाबा पुलिस की निगाह में आ चुके थे। भोजन कर वो कुटिया के बाहर आ कर मंदिर के सामने खड़े हो गये।

हाथ जोड़े और बोले, “और कितने दिन का वनवास है बजरंगी?”

पीछे ओरछा से आरती की आवाज़ शुरू हो गयी थी।

“होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा॥”

मास्टर जी की कही बातें याद आ रही थी। आज़ाद की मुट्ठी बंद होती चली गयी। रात को जब अपनी चटाई पर लेट कर आँख बंद की तो सामने मुस्कुराते हुए खड़े थे,

बिस्मिल, अशफ़ाक, लाहिड़ी और रोशन सिंह!

भारत के स्वतंत्रता संग्राम एक ऐसे ही कुछ गुमनाम क्रांतिकारियों की गाथाएं आप क्रांतिदूत शृंखला में पढ़ सकते हैं जो डॉ. मनीष श्रीवास्तव द्वारा लिखी गयी हैं।

Feature Image Credit: wikipedia.org

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