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ज्ञानेश्वर गणेश

गणपति

बाल्यावस्था से पढ़ाई तथा पुस्तकों में अरूचि थी। दुर्गुणों एवम् व्यसनों से हुई मित्रता ने बाकी बची कसर भी पूरी कर दी। वैसे नैतिकता की सभी बातों से मुझे किसी भी प्रकार से लेना-देना नहीं बचा था लेकिन जब जब चोरी का पैसा लिए मैं घर जाता तब दादी अम्माँ की आंखों में आंखें मिला कर बात कर पाना दुष्कर हो जाता। खैर अभी यह सब सोचना व्यर्थ था, रात्रि का दूसरा प्रहर आरंभ हो चुका था और आज की योजना पर कार्य करने का समय आ चुका था।

नगर के राजमार्ग सुने पड़ चुके थे। पुलिस की पेट्रोल वैन को नगर के इस भाग में आने में अभी आधे घंटे की देरी थी। सामने वाली गली पार करते ही नगर के सबसे प्रतिष्ठित गणेशोत्सव का पंडाल था। इस पण्डाल में विराजमान गणेश जी को इच्छापूर्ति गणेश कहा जाता है। लोगों की मान्यता के अनुसार यह गणेश प्रतिमा से जो मांगो मिलता है।

कितनी हास्यास्पद बात है कि, एक पार्थिव मूर्ति, जिसे दस दिनों के पश्चात जल में विसर्जित कर दिया जाएगा उसके समक्ष रोज सहस्रों की भीड़ हाथ फैलाए आती है। इससे भी अधिक हास्यास्पद बात यह है कि सहस्रों (अंध)श्रद्धालुओं की इच्छा पूरी करने वाली यह मिट्टी की प्रतिमा आज मेरे जैसे नास्तिक को मालामाल करने का साधन बनने वाली है। बस एक बार सफलतापूर्वक यह हाथ मार लूं तो अगले तीन महीने तक का मेरे दारू, नशा, मांसाहार और व्याभिचार जैसे सभी व्यसनों के खर्च की व्यवस्था हो जाएगी।

मैंने मुख्य मार्ग के दोनों ओर देखा, सामने फुटपाथ पर कुछ दरिद्र भिक्षुक संतुष्टि की नींद सो रहे थे। उत्सवों के समय इन्हें भी भरपेट भोजन मिल ही जाता है। इक्का दुक्का लोगों की आंखों से ओझल होते हुए सड़क पार कर के सावधानी से मैं पण्डाल के पिछले भाग से अन्दर घुसने में सफल रहा। आश्चर्यजनक रूप से वहां कोई सेक्योरिटी गार्ड नहीं था। अब आगे का काम आसान था। मैंने मन ही मन में सोचा कि गणेश प्रतिमा के ऊपर सुशोभित स्वर्ण और रत्न जड़ित आभूषणों को त्वरा से उतार कर सकुशल यहां से निकल गया तो बेड़ा पार हो जाएगा।

पण्डाल में कोई हलचल नहीं थी किन्तु जहां प्रतिमा स्थापित की गई थी उस हिस्से को पर्दों से रक्षित किया गया था। मैंने चुपके से पर्दा उठाया। मैं गणेश मूर्ति के पिछले भाग में खड़ा था और मैंने देखा कि दीपक के मंद प्रकाश में भी गणेश जी ने हाथ में धारण किए परशु तथा अंकुश जैसे आयुध दैदीप्यमान प्रतीत हो रहे थे।

मैं उत्सुकतावश प्रतिमा की मोदक, मुकुट और आभूषण इत्यादि मूल्यवान वस्तुएं देखने आगे की ओर बढ़ा… किन्तु… वहां का दृश्य देख कर मेरा हृदय भयभीत हो उठा। वहां एक मनुष्याकृति उपस्थित थी। भयाक्रांत मेरे बाएं हाथ से चोरी के साधनों की पोटली छूट गई। सावधान होते हुए मेरा दूसरा हाथ स्वतः ही पिछली जेब में रखे छुरे पर जा रूका। चोरी से पहले ही मेरा कृत्य पकड़ा गया था।

लेकिन कुछ ही क्षणों में मुझे ज्ञात हुआ कि सामने बैठी मनुष्याकृति एक बालक की है मेरा समस्त भय जाता रहा। गणेश-प्रतिमा और उस बालक के बीच प्रज्ज्वलित दीपक को देख कर ऐसा लग रहा था मानो अपने प्रकाश से वह दोनों के मध्य सेतुबंध की भूमिका निभा रहा था। बालक का प्रकाशित चेहरा उसके अगाध ज्ञान का साक्ष्य दे रहा था लेकिन मुझे इससे क्या लेना देना था, मैंने अपने कार्य में बाधा-रूपी प्रकाश के एकमेव स्त्रोत समान उस दीपक को बुझा दिया। मैंने जेब से छुरा निकाला और उस बालक के गले पर रख दिया। यह कौतुकजनक था कि उसके चेहरे पर भय की रेखा भी नहीं उभरी।

निर्भिकता से भरा वह बालक मेरे समक्ष खड़ा था। भय तो छोड़िए, उसके चेहरे पर सौम्य हास्य था। अब गणेश प्रतिमा और बालक के मध्य सेतु रूपी उस दीपक के स्थान पर मैं खड़ा था। कुछ ही क्षणों में पवित्रता से भरे खंड को मैंने अंधकारमय कर दिया था।

मैं उसे डराने का प्रयास करता उससे पहले ही उस बालक ने अपनी मधुर वाचा को स्वर दिया। वह बोला “ यदि तुम गणेशजी का वैभव चुराने आए हो तो अवश्य चुराओ लेकिन यह रत्न जड़ित स्वर्ण आभूषणों को चुराने का कोई फायदा न होगा। भगवान की प्रतिमा में इससे भी अधिक मूल्यवान भण्डार भरा हुआ है। क्या तुम उसे प्राप्त करना नहीं चाहोगे?”

अष्टादश पुराणें । तींचि मणिभूषणें ।
पदपद्धति खेवणें । प्रमेयरत्‍नांचीं ॥ १:५ ॥

तरी तर्कु तोचि फरशु । नीतिभेदु अंकुशु ।
वेदांतु तो महारसु । मोदकु मिरवे ॥ १:११ ॥

~ श्री  ज्ञानेश्वरी

उसके चेहरे पर ललचाने वाला स्मित था। मैं सतर्क हो गया। कहीं यह बालक मुझे अपने जाल में फंसाकर पकड़वाने की योजना तो नहीं बना रहा? मैंने क्रूरता से उसको कहा “मेरे आगे चालाकी नहीं चलेगी। मुझे मेरा काम कर लेने दो।” मैं अपनी आँखों को क्रूरतम भावों से भर देना चाहता था किन्तु उस बालक की निर्दोषिता से भरी आँखें मेरी क्रूरता में बाधक हो रही थीं।

मैंने निर्दयता से गणेशजी के हाथ का स्वर्णिम ‘अंकुश’ खींच लिया। बालक हंसने लगा। बोला “क्या तुम्हें पता भी है गणेशजी का यह अंकुश न्याय तथा नीति का प्रतीक है…” वह आगे कुछ बोलता उससे पहले ही मैंने उसकी बात काटते हुए कहा “यदि तुम मुझे अंधश्रद्धा के चक्रव्यूह में फंसाना चाहते हो तो यह संभव नहीं होगा। मैं नास्तिक हूं और पार्थिव मूर्ति के न्याय में विश्वास नहीं रखता।”

वह ठहाके लगा कर हंसने लगा और बोला “मैंने कब कहा कि गणेश जी तुम्हारा न्याय करेंगे, तुम स्वयं अपना न्याय करोगे। देवता न्यायाधीश होते तो देवालयों को न्यायालय कहा जाता। तुम्हारी अंतरात्मा ही तुम्हारे कर्मों-कुकर्मों की न्यायाधीश है और तुम्हारा शरीर न्यायालय है। मैं जिस न्याय की बात कर रहा हूं वह भौतिक नहीं, दार्शनिक है।”

उसके उपदेश की अवहेलना करते हुए हुए मैंने गणेशजी के दूसरे हाथ से बहुमूल्य ‘परशु’ भी उतार लिया लेकिन मेरे मस्तिष्क में विचारों का उबाल उठना आरंभ हो चुका था। वह अपने आप को रोक नहीं पाया और बोला “यदि तुम अपने मस्तिष्क का थोड़ा सा भी उपयोग करोगे तो जान जाओगे की यह ‘परशु’ तर्क का प्रतीकात्मक चित्रण है, इसी तर्क रूपी परशु से तुम अपने कुतर्कों को काट पाओगे।”

मैंने क्रोधावेश में उसकी ओर देखा और कहा “मैंने तो कुछ कहा भी नहीं तो फिर तर्कों और कुतर्कों का प्रश्न ही नहीं उठता।” वह फिर से हंसने लगा “बिना बोले ही तुम्हारे मन में शुरू हो चुके तर्क और कुतर्क के तुमुल संग्राम से तुम मुंह नहीं मोड़ सकते। अब यह तुम्हें तय करना होगा कि तुम जो करने जा रहे हो उसमें तुम्हारा हित है या अहित? इस चोरी से प्राप्त होने वाले धन का उपभोग करना अधिक महत्वपूर्ण है या प्रामाणिकता से अर्जित अल्प मात्रा में ही सही जीविका अर्जित कर अपनी वृद्ध अम्मा की आँखों में आँखें डालकर उनके साथ समय व्यतीत करना?”

“तुम्हें मेरी अम्मा के विषय में किसने बताया?”

“मुझे तो तुम्हारे सभी कर्म-काण्ड ज्ञात हैं। इसीलिए कह रहा हूं, अपनी विवेक बुद्धि का प्रयोग करो और अच्छे बुरे का न्याय करो। जो समय और पैसा तुम मदिरालयों में और वैश्यालयों में व्यय करते हो उससे तुम खुश हो? जिनके साथ बैठकर तुम मदिरापान करते हो, जिनके साथ तुम व्याभिचार करते हो, क्या वह तुम्हारे सच्चे स्वजन हैं? याद करो, तुम अन्तिम बार कब अपनी अम्मा की गोद में सिर रख कर सोये थे? क्या बचपन में यह तुम्हारी प्रिय प्रवृत्ति नहीं थी? धन बाद में भी अर्जित किया जा सकता है लेकिन अम्मा का सानिध्य फिर से प्राप्त होना असंभव होगा। जो तर्क रूपी ‘परशु’ तुमने चुराया है उसका प्रयोग करो और बुद्धि रूपी ‘अंकुश’ से अपने विचारों को नियंत्रित कर स्वयं के साथ न्याय करो।”

उसने अपनी बात जारी रखते हुए कहा “मैंने जो कुछ भी कहा है उस पर प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द ‘प्रमाणों’ का आधार ले कर, आत्मा, शरीर, इन्द्रियाँ, अर्थ, बुद्धि, मन, प्रवृत्ति, दोष, प्रेतभाव, फल, दुःख और उपवर्ग के ‘प्रमेयों’ का अनुसंधान करो। तुम्हारे ‘संशयों’ का समाधान तुम्हें स्वयं करना होगा। तुम्हारे जीवन का ‘प्रयोजन’ तुम्हें स्वयं ढूंढना होगा। वाद, वितण्ड, हेत्वाभास और तर्क, हो सकता है कि पूर्व जन्म की विस्मृति के कारण इन शब्दों की व्याख्या तुम्हें ज्ञात ना हो लेकिन तुम्हारे जीवन की दिशा क्या होगी इसका ‘निर्णय’ तो तुम कर ही सकते हो। क्या यह कर पाना तुम्हारे लिए इतना कठिन है?”

जब तक वह बालक अपना कथन पूर्ण करता, मैंने गणेशजी की मोतियों की माला भी अपने हस्तक कर ली थी। मेरे मस्तिष्क में विचारों का तुमुल युद्ध चल रहा था लेकिन इन मूल्यवान रत्नों, आभूषणों की लालसा ने मेरे ज्ञान-चक्षुओं को बांधे रखा था। मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा था कि प्रतिमाकार गणेशजी के लिए हम दोनों का संवाद मनोरंजक हो रहा था और वह सूंड के पीछे से मुस्कुरा रहे थे। मेरे मानसपटल पर चल रही उधेड़बुन का वे पूरा आनंद ले रहे थे।

अनाचार, व्याभिचार जैसी अनेकों बुरी आदतों से ग्रस्त मेरा मन उस अकपट बालक की उलझाने वाली बातों में आने वाला नहीं था। जैसे ही मैंने गणेशजी के मस्तक पर शोभायमान स्वर्ण मुकुट की ओर हाथ बढ़ाया, मेरे फोन की रिंग बज उठी। पड़ोसी का फ़ोन था और उसने जो कहा वह सुनते ही मेरे पैरों तले जमीन सरक गई। दादी अम्मा मूर्छित हो गई थीं। उन्हें अस्पताल ले जाया गया था। मेरे जीवन का एकमात्र आधार… मेरी एकमात्र स्वजन… अनायास ही चोरी के आभूषण मेरे लिए व्यर्थ हो गए थे। बालक के सभी तर्क मैं समझ चुका था, वह सही था और मैं ग़लत!

मेरे पैरों की शक्ति क्षीण होने लगी, मेरे गात्र शिथिल पड़ने लगे। हिम्मत हार कर मैं वहीं गणेश प्रतिमा और बालक के मध्य में बैठ गया। मैंने विवशता से गणेश प्रतिमा की ओर देखा और कहा “मुझे सत्य-असत्य, गुण-अवगुण, न्याय-अन्याय का ज्ञान हो गया है। प्रभु मेरा मार्गदर्शन कीजिए।”

बालक अपने स्थान से उठा और उसने गणपति बप्पा के मोदक की ओर संकेत करते हुए कहा “तर्कों से व्यावहारिक जीवन सुचारू रूप से चल सकता है किन्तु न्याय और तर्क से भगवद्गप्राप्ति नहीं हो सकती। इसीलिए बप्पा अपने भक्तों को वेदान्त दर्शन का प्रतीक मोदक प्रसाद के रूप में वितरित करते हैं। यदि तुम पूर्ण श्रद्धा से हमारे ग्रंथों का अनुसरण करोगे तो गजानन का अभयदान तुम्हारे सभी कार्यों को सफलता प्रदान करेगा। जाओ, अम्मा तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही हैं।”

जब मैं पण्डाल से बाहर जा रहा था तब मैंने देखा कि गणेशजी के आयुध और आभूषण फिर से एक बार प्रतिमा को सुशोभित कर रहे थे। मेरे द्वारा त्याग दिए गए चोरी के औजार धरती पर बिखरे पड़े थे। बालक दीपक फिर से प्रज्जवलित कर रहा था।

* * * * * *

जब मैं अस्पताल पहुंचा तब तक अम्मा सभानावस्था में आ चुकी थीं और पूर्ण रूप से स्वस्थ थीं। उन्होंने अपने दंतहीन चेहरे से मुस्कुरा कर मेरा स्वागत किया। इच्छापूर्ति गणेश जी ने मुझे अपने जीवन का मार्ग दिखा कर मेरी सभी इच्छाओं की पूर्ति कर दी थी।

Image credit: theasianchronicle


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