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क्रांतिदूत – (भाग-३) “मित्रमेला” (पुस्तक समीक्षा)

हम सब अपने जीवन में व्यक्ति/स्थान/ घटना आदि से प्रभावित होते ही है। हम जो वर्तमान में होते हैं, उस रूप को बनाने में कई व्यक्तियों का हाथ होता है। हमें बनाने में हमारे शिक्षकों का भी इसी प्रकार का कुछ योगदान होता है। जीवन में कई शिक्षक आते हैं जरूरी नहीं वह स्कूल या कॉलेज आदि से ही हो। वह कोई भी व्यक्ति शिक्षक रूप में हो सकता है जो हमें कहीं-न-कहीं प्रभावित करता हो। हमारी संस्कृति में भी गुरू का बहुत ही अधिक महत्व है।

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुरेव परंब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः।।

यह संस्कृत श्लोक हमारी संस्कृति में गुरु की महत्ता को बड़े ही सुंदर रूप में दर्शाता है।
इसी प्रकार लेखक ‘डाॅ.मनीष’ ने भी इसमें एक समर्पण लिखा है- “उन भूले बिसरे-शिक्षकों को समर्पित जिन्होंने वीर सावरकर जैसे क्रांतिदूत भारतवर्ष को दिए” यह समर्पण ही इस रचना के बारे में बता देता है कि यह कृति इतिहास के किस व्यक्ति को निश्चय में रख कर लिखी गई है ।

क्रांतिदूत के इस भाग में 20 अध्याय है जिसमें एक कथा 1922 के समय चल रही होती है। हालाँकि यह मुख्य कथा नहीं है। इसकी मुख्य कथा पूर्वदीप्ति (फ्लैशबैक) में चल रही होती है।

रचना का पहला अध्याय ‘लायब्रेरी’- वर्ष 1922, लाहौर से शुरू होता है। जिसमें एक कैदी को पचास वर्ष की सजा सुना दी जाती है। यह वह कैदी है जिसे हम ‘विनायक दामोदर सावरकर’ के नाम से जानते हैं। यह सजा की कथा एक कक्षा में क्रांतिदूत ‘भाई परमानन्द’ द्वारा सुनाई जा रही है। इस कक्षा में कई छात्र हैं जिनमें से दो-तीन छात्र वह हैं जिन्हें हम सब जानते हैं- भगतसिंह, सुखदेव, यशपाल आदि।

इसमें एक अध्याय है ‘चापेकर’। ये चापेकर वही हैं जिन्हें हम सामान्यतः अपनी इतिहास की पुस्तकों में ‘चापेकर बंधु’ के नाम से जानते हैं। चापेकर बंधु परिवार जो कि धार्मिक कथाओं व कीर्तनों में जमा रहता था। उनके साथ अचानक ऐसा क्या होता हैं और वह ऐसा क्या करते हैं कि ‘सावरकर’ चापेकर बंधु से बहुत अधिक प्रभावित हो जाते हैं।
चापेकर बंधुओं की शहादत के बाद लाला जी ने लिखा था “भारत में क्रांतिकारी आंदोलन के जनक असल में तो चापेकर बंधु ही थे।”

चापेकर बंधु द्वारा अपने प्राणों को देश की स्वतंत्रता के लिए न्योछावर कर देना सावरकर को अंदर से गहरे तक झिंडोड़ देता है। उनके दिमाग में अब यहीं था कि सशस्त्र विद्रोह से ही देश को स्वतंत्र कराया जा सकता है।
और फिर वह माँ दुर्गा की प्रतिमा के सामने एक शपथ लेते हैं – “हे माॅं, मैं आपके सामने यह सौगंध लेता हूं कि आज से मेरा पूरा जीवन इस देश की स्वतंत्रता के लिए समर्पित है। आज से मेरे जीवन का एक ही उद्देश्य होगा और वह है भारत की अंग्रेज़ों की गुलामी से मुक्ति।” “स्वतंत्रता संग्राम के इस मार्ग पर, मैं विनायक दामोदर सावरकर, शपथ लेता हूं कि मैं गुप्त रूप से अपने समाज को संगठित करूॅंगा। अपने देशवासियों को शिक्षित करूॅंगा, उनको स्वतंत्रता के लिए होने वाले युद्ध के लिए तैयार करूॅंगा, आज से मेरा जीवन सिर्फ इसी संघर्ष के नाम है इस संघर्ष पथ पर अगर मेरी मृत्यु भी हुई तो मैं उसे हॅंसकर गले लगा लूंगा।”

और फिर वह 1899 में ‘मित्रमेला’ नामक गुप्त संगठन की स्थापना करते हैं। और इस संगठन के नेता बनते हैं ‘विनायक दामोदर सावरकर’। जब वह ‘मित्रमेला’ का विस्तार संपूर्ण भारत में करते हैं तो यही संगठन 1909 में ‘अभिनव भारत’ कहलाता है। जिस दिन ‘मित्रमेला’ का विस्तार कर उसे ‘अभिनव भारत’ नाम दिया जाता है उसी दिन सावरकर और उनके साथी ‘छत्रपति शिवाजी महाराज’ के सामने खड़े होकर कसम खाते है जिसके बारे में आप इस रचना में पढ़ेंगे।

इसी रचना में एक और अत्यंत ही प्रमुख व्यक्ति की चर्चा होती है जिनके नाम से हम सभी भली-भाँति परिचित है – ‘श्यामजी कृष्ण वर्मा’। लेखक ने बताया है कि कैसे वह विदेशी धरती पर विशेषकर इंग्लैण्ड में रहकर भारत की आजादी के लिए कार्य कर रहे थे। उन्होंने “द इंडियन होम रूल सोसाइटी”, “इंडिया हाउस” आदि की स्थापना करते हैं। इन्होंने कई पत्रों का भी प्रकाशन किया है।

सावरकर जब इंग्लैण्ड जाते हैं तो वह इसी “इंडिया हाउस अपने क्रांतिकारी कार्यों को आगे बढ़ाते हैं। वह वहाॅं पर रहकर कई पत्रिकाओं का भी संपादन करते हैं।

इस रचना में एक अध्याय है जिसे लेखक ने नाम दिया है ‘अर्धसत्य’ जो कि अत्यंत ही रोचक है जिसमें कुछ ऐसी बातें हैं जिस पर आप विश्वास तो नहीं कर पायेंगे परंतु जो यह बातें कह रहे होते हैं उनके द्वारा सुनने पर आप इसकी गहराई में जाकर पूर्ण सत्य को जानने की कोशिश अवश्य करेंगे।

1906 में सावरकर इंग्लैंड पहुंचते हैं और 1907 में 1857 की क्रांति को 50 वर्ष पूरे हो रहे थे। यहाँ पर सावरकर ‘1857 की क्रांति’ के बारे में जानने की उनकी इच्छा उत्कट हो उठती है। वह जानना चाहते हैं कि क्या यह केवल एक जोश में लिया गया निर्णय था ? या फिर स्वतंत्रता की प्राप्ति के लिए उठाया गया एक सोचा समझा कदम ? आखिर कौन थे इस सिपाही विद्रोह के कर्ता-धर्ता ? क्या 1857 का युद्ध केवल कुछ कट्टर धार्मिक और बर्बर लोगों का विद्रोह मात्र था जिसे कुचल दिया गया था?….

इन्हीं बातों को जानने की इच्छा और इस पर शोध करते हुए सावरकर एक पुस्तक की रचना करते हैं जिसे उन्होंने नाम दिया – “1857 का स्वातंत्र्य समर ”

1908 में जब वह वह अपनी इस पुस्तक का लोकार्पण करते हैं। उस समय के अपने अभिभाषण में वह एक बात कहते हैं जिसे हमें हमेशा ही ध्यान में रखना चाहिए – “मेरा मानना है कि जिस राष्ट्र को अपने अतीत के संबंध में ही वास्तविक ज्ञान ना हो उसके कोई भविष्य नहीं होता। किंतु जहाॅं यह सत्य है वहाॅं यह भी एक महान सत्य है कि किसी राष्ट्र को अपने गौरवपूर्ण अतीत की मस्ती में ही नहीं लिपटे रहना चाहिए। भविष्य को सॅंवारने की दृष्टि से भी इतिहास और अतीत का उपयोग करने की क्षमता राष्ट्र से अपेक्षित है।”

“मैं इस बात पर भी जोर देता हूॅं कि किसी राष्ट्र को अपने देश के इतिहास का दास नहीं अपितु स्वामी बनना चाहिए क्योंकि अतीत के कार्यों की पुनरावृति महत्वपूर्ण होने पर भी वज्र मूर्खता ही है।”

यह आज़ कल फैशन हो गया है कि कोई भी सावरकर को माफीवीर कह कर संबोधित कर देता है और बता देता है कि उन्होंने भारत की स्वतंत्रता के लिए कुछ नहीं किया। परंतु इसे पढ़ने पर आपको पता चलता है कि वो वास्तव में क्या थे। उन्होंने अपनी मातृभूमि को स्वतंत्र करवाने के लिए बहुत अधिक संघर्ष किए।

डॉ. मनीष द्वारा हमारे इतिहास को कहानियों के साॅंचे में ढालकर प्रस्तुत करना अत्यंत ही रुचिकर है। यह इस शृंखला के तीसरे भाग की समीक्षा है। लेखक ने बताया है कि क्रांतिदूत शृंखला के 10 भाग आयेंगे। इसमें से 5 भाग प्रकाशित हो चुके हैं। छठा भाग इसी महीने आने की संभावना है।

आशा है इस शृंखला की अन्य पुस्तकें भी हमें अत्यंत ही रुचिकर लगेंगी। लेखक और प्रकाशक को इस शृंखला को हमारे समक्ष लाने के लिए आभार और आगे आने वाले अन्य भागों के लिए शुभकामनाएं।

पुस्तक का मूल्य ₹249 है और यह हार्डकवर में उपलब्ध है।

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