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श्रीराम का कूटनीतिज्ञ स्वरूप : भाग – २

भाग-१

शत्रुघ्न ने श्रीराम की आज्ञा पर दक्षिण की ओर बढ़कर विदिशा पर भी अधिकार कर लिया और वहां नियुक्त किया अपने पुत्र शत्रुघाती को ।

उन्होंने लक्ष्मण की राजसूय यज्ञ करने की सलाह के विरुद्ध भरत के मत के कारण भाइयों में मतभेद को टालने के लिये  राजसूय यज्ञ के अनुष्ठान के विचार को तज कर अपने पूर्वज रघु की भांति पूरे भारत के पुनः राजनैतिक एकीकरण और ‘चक्रवर्ती’ उपाधि धारण करने का विचार तो छोड़ दिया परंतु राजनैतिक स्थिरता के लिये सम्पूर्ण भारत को एक दृढ़ संगठित रूप देने की कोशिश अवश्य की ।

अश्वमेध के दौरान संधि संरक्षित राज्य के पक्ष में सहायता को आये महारुद्र शिव से एक संक्षिप्त युद्ध और संधि के पश्चात उत्तर की दिशा सुरक्षित हो गयी जिससे अयोध्या साम्राज्य रुद्रों के अधीन कश्मीर में बसे ‘यक्ष’ , ‘नाग’ और ‘पिशाच’ जातियों की अराजकता से सुरक्षित हो गया । यक्षराज कुबेर यों भी श्रीराम के प्रति अत्यंत श्रद्धा रखते ही थे ।

सर्वाधिक समस्या थी उत्तर पश्चिम में और उसके मूल में थे ‘गंधर्व’ । उन्होंने पूरे पश्चिमोत्तर क्षेत्र में आतंक मचा रखा था और यहां तक कि उन्होंने आनव नरेश और भरत के मामा युधाजित पर आक्रमण कर उनकी हत्या कर दी । अवसर की तलाश में बैठे श्रीराम ने तुरंत भरत और उनके पुत्रों तक्ष व पुष्कल के सेनापतित्व में एक विशाल सेना बाह्लीक प्रदेश में भेज दी जिनका स्वागत मुक्तिदायिनी सेना के रूप में आनवों ने किया । गंधर्वों को  वापस अपने हिमाचल व पामीर की ओर भागना पड़ा ।

भरत ने आनवों और द्रुह्युओं की सहायता से सुदूर पश्चिम में सबसे अग्रिम सैन्य चौकी के रूप में अपने ज्येष्ठ पुत्र पुष्कल के  नाम पर पुष्कलावती और उसके पीछे सिंधु के पूर्वी तट पर तक्ष के नाम पर तक्षशिला की स्थापना की । पुष्कल और तक्ष के राजवंशों का क्या हुआ यह स्पष्ट नहीं है । संभवतः वे स्थानीय गणक्षत्रियों में समाहित हो गये परंतु उनके नाम पर बसे ये सैन्यकेन्द्र आगे चलकर वैभवशाली नगरों के रूप में विकसित हुये ।

कालांतर में सिंधु के नीचे रावी के तट पर राम ने  अपने कनिष्ठ पुत्र लव के प्रभार में लवपुर बसाया जो  मद्रों व कठों के कारण विशेष विस्तृत ना हो सका लेकिन संभवतः वह एक छोटी बस्ती या गाँव के रूप में किसी तरह बना रहा और लोकस्मृति में उसके संस्थापक का नाम भी जो आगे जाकर 9वीं शताब्दी में दुर्ग रूप में लोहकोट और नगरीकृत रूप में ‘लवपुर’ या लाहौर के रूप में प्रसिद्ध हुआ जहां किसी काल में इसके संस्थापक लव की स्मृति में बनाया गया ‘लव मंदिर’ जीर्ण शीर्ण दशा में आज भी उपस्थित है ।

उधर दंडकवन प्राचीनकाल से इक्ष्वाकुओं की एक शाखा के पूर्वज राजा दंडके अधिकार में था परंतु किसी भृगु पुरोहित की पुत्री के साथ दंड द्वारा बलात्कार के कारण आर्यों में फूट पड़ गयी जिसका लाभ उठाकर राक्षसों ने इक्ष्वाकुओं को वहां से खदेड़ दिया था यद्यपि इक्ष्वाकुओं की एक शाखा का छोटा सा राज्य वहां स्थापित था जो कोशल के दक्षिणी भाग दक्षिण कोशल के नाम पर दक्षिण कोशल ही कहलाया । आज यह क्षेत्र छत्तीसगढ़ कहलाता है । स्वयं श्रीराम की माँ कोशल्या दक्षिण कोशल की ही राजकुमारी थीं , इसलिये वह क्षेत्र श्रीराम की ननिहाल भी था । खर दूषण के नेतृत्व वाले राक्षस स्कंधावार के विध्वंस के पश्चात ही वहां शक्ति शून्य पैदा हो चुका था , इसलिये उन्होंने वहां भी सेनायें भेज दीं और वहाँ पहले से बसे इक्ष्वाकुओं की मदद से अयोध्या के दक्षिण में बसाये गये कुशावती के नाम पर दक्षिण कोशल में भी कुशावती के नाम पर एक और सैन्यकेंद्र बनाया गया  और कालांतर में उसका प्रभारी कुश को बनाया । कुछ लोग कुशावती को द्वारका मानते हैं जहाँ शार्यातों के रूप में बसी हुई इक्ष्वाकुओं की एक शाखा को असुरों ने अपदस्थ कर रखा था । परंतु कुशावती का दक्षिण कोशल अर्थात छत्तीसगढ़ में होना अधिक समीचीन प्रतीत होता है ।

अब पश्चिमोत्तर से दक्षिण में कुशावती तक एक सशक्त प्रतिरक्षा पंक्ति तैयार हो चुकी थी परंतु अभी भी श्रीराम संतुष्ट नहीं थे क्योंकि मथुरा और तक्षशिला के बीच में एक बड़ी दरार थी उसे भरने के लिये उन्होंने चुना अपने सर्वाधिक विश्वासपात्र अनुज लक्ष्मण की संतानों अंगद और चित्रकेतु को जो पहले ही अयोध्या के उत्तर में अंगदीयापुरी और पूर्व में मल्लजाति के क्षेत्र में कारूपथ नामक नगर के प्रभारी थे ।

चित्रकेतु मल्लों में इस कदर लोकप्रिय हो चुके थे कि उनका दूसरा नाम ” मल्ल ” ही लोकप्रिय हो गया ।

कारूपथ की स्थापना संभवतः पूर्व में असम की ओर से बाणासुर पीठ व उसके सहयोगियों के किसी संभावित अभियान को रोकने के लिए और कोशल के मित्र राज्य काशी , अंग व बंग को सहायता प्रदान करने के लिये की गयी ।

श्रीराम ने लवपुर और मधुरा के बीच में पूर्व की अंगदीयपुरी और कारूपथ के नाम पर ही पंजाब में भी अंगदीयपुरी और कारुपथ के नाम से दो और सैन्य केंद्रों की स्थापना  की । अंगदीयपुरी का अस्तित्व अधिक नहीं चल सका लेकिन चित्रकेतु के साथ गये उनके निष्ठावान “मल्ल” जनों ने वहां अपने पैर जमा लिये और कहलाये मालव । कालांतर में इनकी नगरी जिसे कालिदास ने “कारापथ” कहा , वह पीछे छूट गयी और मालव रावी और चेनाब के उपरले काठे में बस गये । निचले काठे या क्षुद्र भाग में बसे आर्यजन अपनी बस्ती की भौगोलिक स्थिति के कारण कहलाये क्षुद्रक अर्थात ‘निचले’ ।

अब उत्तर पश्चिम दिशा एक प्रतिरक्षा रेखा द्वारा सुरक्षित थी जिसका एक बिंदु पुष्कलावती था और दूसरा बिंदू था दक्षिण कोशल में कुशावती में ।

केंद्र में अयोध्या चारों ओर से लक्ष्मणपुरी (लखनऊ) , अंगदीयपुरी , कारूपथ, मथुरा और श्रंगवेरपुर द्वारा सुरक्षित थी

इस प्रकार श्रीराम ने अयोध्या साम्राज्य को दोहरी सुरक्षापंक्ति से घेर दिया । साम्राज्य के रूप में भारत का राजनैतिक संगठन पूराकर उन्होंने इस राष्ट्र को एक बार फिर एकीकृत कर राजनैतिक  स्थिरता की नींव डाली ।

स्वयं के प्रभार वाली सदृढ़ गुप्तचर व्यवस्था , शत्रुघ्न के सेनापतित्व में विशालशक्तिशाली सेना व लक्ष्मण के प्रभार में उदार परंतु सचेत निगरानी वाले आर्थिक तंत्र के आधार पर उन्होंने उस प्रशासनिक व्यवस्था की स्थापना की जिसे इतिहास में एक ऐसे मानक के रूप में देखा गया जो अब तक रामराज्य के रूप में यूटोपिया बना हुआ है और जिसे केवल गुप्त सम्राट ही कुछ हद तक प्राप्त कर पाये।

इति!

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